मंगलवार, जुलाई 31, 2012

शिव शिव महाशम्भो ..! [कविता] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

केश कुन्तल घन कराल 
व्याल गल में मुण्ड माल 
शीश शशि नेत्र भाल 
डम डम डमऽ डम 
डमरू के संग थिरको 
शिव शिव महाशम्भो


मम हृदय पीड़ा ज्वाल 
तव भक्ति उर हो सर्वदा 
स्त्रोत आहुति यज्ञ हो विशाल 
जीवन प्राण पल में डाल 
मयूर मन मम नाच उठे 
हे ! स्नेह घन बरसो 
शिव शिव महाशम्भो


द्रुत दामिनी घन गामिनी 
तड़ तड़ तड़ऽ तड़ नीर निर्झर 
झर झर झरऽ झर और टर टर 
घिर घिर गरज कर 
एक है सब अवनि अम्बर
प्रलय ताण्डव नृत्य बनकर 
हे! हे! महाशंकर चराचर स्वामि 
करता 'कान्त' है 
शिव शिव महाशम्भो
©तृषा’कान्त’

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बृहस्पतिवार, जुलाई 26, 2012

कारगिल के झरोखे से.... [ आलेख ] - श्रीकन्त मिश्र ’कान्त’


... कई सलोने नन्हें हाथों को खिलौने छोड़ कर पिता की चिता को अग्नि देनी पड़ी। अनेकों भोली बहनों की राखी पहली बार रक्षाबंधन के थाल में ज्योति के साथ रखे अमर शहीद भाई का चित्र देख कर फफक पड़ी। उर विदग्धित माँ ने अपने ऑंसू उसी दिन मोती की भाँति बाँध लिये जिस दिन अपनी विधवा सैनिक बहू को पति की चिता के सन्मुख अन्तिम बार सैल्यूट करते देखा। बेटे को अन्तिम बार सैनिक सम्मान के साथ विदा दे चुका पिता, गर्वोन्नत माथा लिये लेकिन खोयी हुयी ऑंखों से चुपचाप मासूम पोते को निहारता रहता है। अनन्त हैं एैसे अमिट पगचिन्ह जो कारगिल के शहीदों एवं उनके परिवारों ने हमारे हृदय पर छोड़े हैं। - तृषाकान्त
      शान्ति की ' किरण ' आदिकाल से ही मानव जीवन को उन्नति एवं समृद्धि के मार्ग पर प्रेरित करती रही है। वहीं पर अशान्ति के काल कराल से मेघ प्रायः प्रचण्ड भगवान भुवन भास्कर को भी कुछ काल के लिये ढकते आये हैं। शान्ति एवं अशान्ति की यह लुका छिपी ग्रहण के रूप में स्रष्टि के आरम्भ से निरन्तर जारी है।

      तमस की धुँधली छाया मात्र से दिग्भ्रमित हो किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाने वाले कापुरूषों के बीच ही पलते बढ़ते हैं वह महानायक भी जो साहस एवं धैर्य का अद्भुत परिचय देते हुये भीषण एवं बिषम परिस्थतियों से रास्ता बनाते हुये काल के शिलाखण्डों पर अपने अमिट पग चिन्ह छोड़ ज़ाते हैं।

      पारस्परिक विस्वास मानव सभ्यता के सतत् विकास एवं निरन्तरता की पहली सीढ़ी है। ईष्या एवं बैर भाव किसी पक्ष का हित साधन नहीं करते। फिर भी कई बार किसी व्यक्ति बिशेष की जड़ता, मूढ़ता एवं स्वयं को किसी भी कीमत पर सर्वोपरि मानने की बुध्दि समस्त मानव समाज को ही विनाशोन्मुख कर देती है। विगत में कारगिल युद्ध के समय भी हमारे पड़ोसी राष्ट्र ने एैसी ही विपरीत बुद्धि का परिचय दिया। कारगिल के शान्त समाधिस्थ श्वेत हिमखण्डों को अपनी काली करतूतों से मैला करने का उनका असफल प्रयास.... वहां पर धोखे से पैठ बना लेने वाले घुसपैठियों को मार भगाने वाले वीर जवानों एवं अमर शहीदों के अनेकों अमिट पग चिन्ह उन श्वेत शीत चोटियों पर अपनी छाप छोड़ चुके हैं।

      युद्ध किसी भी युग में कभी भी वाँछित नहीं होता। फिर भी अशान्ति के बादलों को चीर कर तमाच्छादित पृथ्वी पर शान्ति का सूर्योदय कई बार युद्ध के द्वारा ही हुआ है। आदि काव्य रामायण से लेकर महाभारत के पृष्ठों से झांकते अमिट उदाहरण स्मरणीय हैं किन्तु युद्धोपरान्त जब विनाश का आकलन किया जाता है तो समस्त मानव जाति को यही विदित होता है कि किसी के जीतने के स्थान पर सम्पूर्ण मानवता हार गयी। हमारे शान्तिप्रिय राष्ट्र पर थोपे गये कारगिल घटनाक्रम में भारतीय सेना के सभी अंगों ने उन बर्फीली चट्टानों पर राष्ट्रप्रेम¸ सर्वोच्च त्त्याग एवं वीरता की अनेकों अद्भुत गाथायें अपने सर्वोच्च त्याग और बलिदान के रक्त से लिख डालीं। सारा विश्व हमारे संयम, साहस एवं एकजुटता से चकाचौंध हो उठा।

      कई सलोने नन्हें हाथों को खिलौने छोड़ कर पिता की चिता को अग्नि देनी पड़ी। अनेकों भोली बहनों की राखी पहली बार रक्षाबंधन के थाल में ज्योति के साथ रखे अमर शहीद भाई का चित्र देख कर फफक पड़ी। उर विदग्धित माँ ने अपने ऑंसू उसी दिन मोती की भाँति बाँध लिये जिस दिन अपनी विधवा सैनिक बहू को पति की चिता के सन्मुख अन्तिम बार सैल्यूट करते देखा। बेटे को अन्तिम बार सैनिक सम्मान के साथ विदा दे चुका पिता, गर्वोन्नत  माथा लिये लेकिन खोयी हुयी ऑंखों से चुपचाप मासूम पोते को निहारता  रहता है। अनन्त हैं एैसे अमिट पगचिन्ह जो कारगिल के शहीदों एवं उनके परिवारों ने हमारे हृदय पर छोड़े हैं। कारगिल दिवस तथा रक्षाबन्धन के बिशेष अवसर पर उन सभी शहीदों एवं उनके परिवारों को शत् शत् नमन् ....!!

आपरेशन विजय एवं आपरेशन सफेद सागर के नाम से प्रारम्भ हुये सफल अभियान की यह अनूठी कहानियाँ लिखी गयी हैं भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर एवं हमारे हृदयों में...  समस्त बलिदानी वीरों की हुतात्त्मायें अमर जवान ज्योति में विलीन होकर भारतीय सन्तानों को  सदैव प्रेरित करती रहेंगी... और गूँजते रहेंगे हवा के झोंको के साथ ये शब्द...
                       
 तेरा वैभव अमर रहे माँ
 हम दिन चार रहें न रहें

 ©तृषा’कान्त’

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बुधवार, जुलाई 25, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग - 14 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र


... आप रामायणकालीन व्यापार के विषय में क्या अनुमान लगाना चाहेंगे। व्यापार की प्रवृत्ति स्थानीय है ? स्वरूप सरल और प्रारम्भिक है ? यदि हम इस तथ्य को स्वीकार करें तो सामान्यतः इस तरह का व्यापार का संचालन अतीत में वस्तुओं के ’’आदान-प्रदान’’ की विधि से संचालित होता रहा है। ऐसे में ’’निष्क और रूक्म’’ जो चाहें अलग-अलग हों अथवा एक। निश्चित ही बड़ी मुद्राएं हैं क्योंकि इन्हें स्वर्ण निर्मित बताया गया है, संदेह उत्पन्न करती है। एक प्रश्न और भी है क्या व्यापार मात्र बड़ी मुद्रा से संभव है। विशेषतः व्यापार की जो प्रवृत्ति रामायण प्रदर्शित कर रही है, उस तरह का व्यापार और फिर किसी भी छोटी ’’मुद्रा’’ का परिचय रामायण हमें नही देती - तृषाकान्त
 (14)  रामायण में व्यापार और मुद्राएं
रामायण महाकाव्य है जिसे हिन्दू व्यवस्था इतिहास स्वीकार करती है। इस महाकाव्य में क्या व्यापार और मुद्रा के चलन का प्रयोग है ? अयोध्या काण्ड सर्ग 170/47 में रत्नपरिपूरित दुकानों का उल्लेख है। अयो0का0 17/3 से 6 में जो व्यापार वाणिज्य की सामग्री उल्लिखित है, उस पर ध्यान दें - चन्दन, अगरू एवं अन्य सुगंध ’’क्षौम कौशाम्बर’’ (अलसी या सन तथा रेशम निर्मित वस्त्र) अबिद्ध मोती, उत्तम स्फटिक, उस राजपथ की शोभा बढ़ा रहे थे। दधि, अक्षत, हविष्य, लावा, धूप, अगरू चन्दन, पुष्पहार आदि।’’
यदि हम मुद्रा की बात करें तो अयो0 काण्ड 31/37 में वनगमन प्रेरित राम द्वारा 1000 निष्क वशिष्ठ पुत्र सुयज्ञ को देने का प्रसंग आता है। अन्यत्र इसी काण्ड में सचिव को भी 1000 निष्क देने का प्रसंग आता है।
राम अयोध्या से वन जाते समय कौशल देश की सीमा पार करते हैं जो सामन्त शासित राज्य है। (अयो0का0/50/11) इसके बाद श्रंगवेरपुर के निषादराज गुह राम से भेंट करते हैं। फिर राम नाव से गंगा पार कर वत्स देश (प्रयाग) पहुंचते हैं। यहां पर राम आखेट करते हैं। वत्स के बाद भरद्वाज आश्रम और फिर चित्रकूट पहुंच जाते हैं। यह आश्रम क्षेत्र है। अतः व्यापार का कोई प्रश्न ही नही।
प्रश्न:- व्यापार में वस्तुएं एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जायी जायेंगी। उनको बेंचा जायेगा और वस्तुओं के बदले में विक्रेता या तो अन्य वस्तुएं क्रेता से प्राप्त करेगा या धन प्राप्त करेगा। चूंकि निष्कनामक स्वर्ण मुद्रा का प्रचलन देख रहे हैं तो मुद्रा ही व्यापार का माध्यम होना चाहिए। किंतु अभी तक रामको मार्ग में कहीं व्यापारिक काफिले क्यों नही मिले हैं।
            अयोध्या काण्ड सर्ग 68 से एक अन्य यात्रा प्रारम्भ होती है। अयोध्या के राजदूत भरत की ननिहाल कैकय देश जा रहे हैं मार्ग में वे हस्तिनापुर में गंगा पार कर वहां सेपश्चिम पांचाल देश और कुरूजांगल प्रदेश के बीच से आगे बढ़े। मार्ग में उन्हें तेजोभिभवन एवं अभिकाल नामक गांवो को पार करते हुए वह कैकय देश पहुंच गए।

प्रश्न/टिप्पणी:- अयोध्या के राजदूतों के इस मार्ग में कोई वाणिज्यिक जानकारी नही मिलती है। न ही कोई व्यापारिक काफिला इन्हें मार्ग में मिलता है। ये मार्ग में कुछ क्रय भी नहीं करते हैं जिससे मुद्राप्रयोग की जानकारी प्राप्त हो।
            अब हम भरत की कैकय के अयोध्या तक की यात्रा देखते हैं। अयो0का0/70/21 में ’’रूक्मनिष्क सहस्त्रे द्वे’’ के रूप में हम दो सहस्त्र रूक्म निष्कस्वर्णमुद्राएं भरत के नाना द्वारा अन्य उपहारों के साथ भेंट किए जाते देखते हैं। इससे पूर्व हम राम द्वारा सुयज्ञ को 1000 निष्क भेंट किए जाते देख चुके हैं। किंतु यहां पर ’’रूक्म निष्क’’ का प्रयोग हुआ है। ये एक ही है। अथवा पृथक-पृथक इसकी चर्चा हम आगे करेंगे।
            अयो0का/सर्ग 71 भरत कैकय की राजधानी राजगृह से निकलकर पूर्व दिशा की ओर चलते हैं। इस मार्ग की चर्चा हम कृषि संबंधी खण्ड भाग 12 में कर चुके हैं। अतः पुनरावृत्ति करना यहां उचित नहीं होगा। भरत अपनी सेना सहित 7 रात्रियां मार्ग में व्यतीत कर अयोध्या पहुंचते हैं। मार्ग में वे जिन नगर ग्रामों को पार करते हैं उनके नाम क्रमानुसार (गिरिव्रज - अयोध्या) इस प्रकार हैं - ऐलधान ग्राम - अपरपर्वत जनपद - शल्यकर्षण देश - वीरमत्स्य देश - उत्तरवर्ती अन्य देश - अंशुधान ग्राम - धर्मवर्धन ग्राम - तोरण ग्राम - जम्बूप्रस्थ - वरूथ ग्राम - उज्जिहाना नगरी - सर्वतीर्थ ग्राम - हस्तिपृष्ठ ग्राम - लोहित्य ग्राम - एकसाल नगरी - विनत ग्राम - कलिंग नगर - और इसके बाद अयोध्या।

टिप्पणी/प्रश्न:- इस सम्पूर्ण यात्रा मार्ग में ग्रामों - नगरों का आधिक्य है किंतु रामायणकार न तो स्थानीय स्तर पर किसी व्यापारिक गतिविधि की जानकारी देता है और न ही सम्पूर्ण मार्ग में व्यापारिक काफिलों से भेंट करवाता है। मुद्रा के प्रयोग का भी कोई अवसर अब तक सुलभ नहीं है।
            अयोध्या के बाजारों का दृश्य अब तक आपने जो देखा है उसमें वाणिज्यिक - व्यापारिक गतिविधियों की जीवन्तता कितनी है इसका निर्णय आप पर ही छोड़ता हूँ।
            व्यापारिक गतिविधियों की दृष्टि से अयोध्या काण्ड ही महत्वपूर्ण है। अरण्य एवं सुन्दरकाण्ड वन्य जीवन है। जबकि किनिष्कंधा एवं युद्ध काण्ड में नगरीय जीवन की हल्की सी झलक अवश्य मिलती है किंतु अधिकांश वातावरण युद्ध का ही है। हाँ इतना अवश्य है कि युद्धकाल प्रायः व्यापारिक समूहों के लिए सदैव ही व्यापार और लाभार्जन का एक अवसर होता है किंतु किष्किन्धा अथवा युद्धकाण्ड हमें ऐसे व्यापारियों अथवा व्यापारी समूहों से कोई परिचय नहीं कराता।
            अयोध्याकाण्ड के सर्ग 80 एवं 83 के आधार पर नीचे हम व्यापार कर्म की एक तालिका बना सकते हैं।                       
अयोध्याकाण्ड/सर्ग-80/श्लोक संख्या 1-22 सम्पूर्ण सर्ग
ध्यान रहे कि ये सभी सेवा कर्मी हैं। किंतु ये सभी कर्म नागरिक उपयोग के भी हैं। चटाई निर्माता अथवा चर्मकर्म स्थानीय प्रवृत्ति के अतिशय प्रारम्भिक स्तर के व्यापार कर्म स्वीकार किए जा सकते हैं।
1-         भूमि प्रदेशज्ञ  -     भूमि के जानकार     
2-         सूत्रकर्म विशारद     -          
3-         यंत्र कोविद   -     भूमि खोदने वाले    
4-         मार्ग रक्षक   -     मार्ग के रक्षक      
5-         सूपकार      -     चटाई निर्माता/सूप निर्माता  
6-         सुधाकार      -     पुताई/चूने का काम करने वाले    
7-         वंशचर्मकृत   -     चमड़े का कार्य करने वाले  
8-         खनक       -     खुदाई करने वाले   
9-         यंत्रक       -     सुरंग निर्माता
10-       वर्धक -          
11-       वृक्षतक्षक     -     वृक्ष काटने वाले    
अयोध्या काण्ड सर्ग 83 श्लोक 12-16
अन्य सूची भी हैं, जिससे व्यापार की प्रवृत्ति पर प्रकाश पड़ता है।
1-         मणिकार           -     मणियों को चमकाने वाला
2-         कुम्भकार           -     कुम्हार - मिटटी के बर्तन बनाने वाला
3-         सूत्रकर्म विशेषज्ञ     -     पीछे देख चुके हैं। जुलाहा मान सकते हैं
4-         शस्त्रोपजीविन       -     सैन्यकर्मी अथवा शस्त्र निर्माता
5-         मायूरक            -     मोरपंख के पंखे आदि बनाने वाले
6-         क्राकचिक           -     आरे से लकड़ी चीरने वाला
7-         वेद्यक             -     छेद करने वाले
8-         रोचक             -     दीवारों आदि को अलंकृत करने वाले
9-         दन्तकार           -     हाथी दांत आदि के कारीगर
10-       सुधाकार            -     चूना आदि के निर्माण या पुताई कर्मी
11-       गंधोपजीवी          -     इत्र आदि के निर्माता/विक्रेता
12-       सुवर्णकार           -     सुनार
13-       कम्बल कारका      -     कम्बल आदि बनाने वाले
14-       स्नापष्णोकः         -     गरम जल में नहलाने वाले कहार
15-       वैद्य             -     चिकित्सक
16-       धूपकः             -     धूप आदि देने वाले/मशाल आदि जलाने वाले
17-       गोण्डिक            -     मद्य विक्रेता
18-       रजक              -     धोबी
19-       तन्तुवाय           -     दर्जी
20-       ग्रामघोण महत्तर    -     ग्रामों गौशालाओं के महतो
21-       शैलूण             -     नट
22-       कैवतर्क                  -     केवट

            आप रामायणकालीन व्यापार के विषय में क्या अनुमान लगाना चाहेंगे। व्यापार की प्रवृत्ति स्थानीय है ? स्वरूप सरल और प्रारम्भिक है ? यदि हम इस तथ्य को स्वीकार करें तो सामान्यतः इस तरह का व्यापार का संचालन अतीत में वस्तुओं के ’’आदान-प्रदान’’ की विधि से संचालित होता रहा है। ऐसे में ’’निष्क और रूक्म’’ जो चाहें अलग-अलग हों अथवा एक। निश्चित ही बड़ी मुद्राएं हैं क्योंकि इन्हें स्वर्ण निर्मित बताया गया है, संदेह उत्पन्न करती है। एक प्रश्न और भी है क्या व्यापार मात्र बड़ी मुद्रा से संभव है। विशेषतः व्यापार की जो प्रवृत्ति रामायण प्रदर्शित कर रही है, उस तरह का व्यापार और फिर किसी भी छोटी ’’मुद्रा’’ का परिचय रामायण हमें नही देती।
निष्क:- वेद में हिरण्य’ (स्वर्ण निर्मित आभूषण था जो बाद में मुद्रा के रूप में प्रयोग होने लगा) उत्तरवैदिक काल में निष्कनियमित स्वर्णमुद्रा न होकर धातु का एक ढेर था। उत्तरवैदिक काल में शतमान 100 रत्ती से पदार्थ शतमान 118 शतमान प्रचलित था। 320 रत्ती स्वर्ण कहा जाता था। वैदिक काल लगभग 10000पू0 तक नियमित मुद्रा का प्रचलन इतिहास कार नहीं मानते। उत्तर वैदिक काल में निष्क-शतमान, पाद, कृष्णवल, आदि मुद्रा की अन्य इकाईयां भी प्रचलन में थी।
रूक्म:- ? कृपया पाठक बंधुओं पर यदि कोई जानकारी हो तो उपलब्ध करायें।
            यदि अब तक के लेख का विश्लेषण करें तो संभवतः आप कुछ बिन्दुओं पर सहमत हों:-
1- व्यापार स्थानीय प्रवृत्ति का है और अतिशय प्रारम्भिक स्तर का है।
2- मुद्रा के प्रयोग को स्वीकार करना अतिशय कठिन एवं दुष्कर है।
3- संभवतः व्यापार का माध्यम सेवा अथवा वस्तुओं का आदान-प्रदान है। (..... अनवरत्)
 ©तृषा’कान्त’

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बुधवार, जुलाई 18, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग - 13 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र


...विगत अंक में आपने पढ़ा कि किस प्रकार रामायण के पात्रों का कृषि कर्म से परिचित होना संदिग्ध लगता है। आगे पढे़ - तृषाकान्त
13  रामायण में कृषि : भाग -2

रामायण के पात्र खेतों में अनाज बोना, काटना एवं हल चलाना नहीं जानते हैं। उन्हें खुरपी, कुदाल, फावड़े की जानकारी नही है। हाँ यह संभव है कि जमीन की ऊपरी परत को खुरचकर कंदमूल, अथवा फलादि के वानस्पतिक पौधों को रोपना चाहते हैं। इसे वन्य कृषि का एक रूप मान सकते हैं। इसी आधार पर हम आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।

कृषि का इतिहास - विश्व एवं भारतीय उपमहाद्वीप
विकीपीडिया एवं अन्य के सहयोग से

कृषि जिसमें पशुओं और पौधों का Domestication शामिल है, कम से कम 10000 वर्ष पूर्व प्रारम्भ किए गए होंगे। यद्यपि Forest Gardening एवं Firestick farming संभवतः पूर्व Prehistoric काल में प्रारम्भ हो गए होंगे। Agriculture has undergone significant developments since the time of the earliest cultivation. The fertile crescent of Western Asia. Egpt and India were sites of the earliest planned sowing and harvesting of plants that had previously been gathered in the wild.
Scholars have proposed a number of theories to explain the historical development of farming. The transition from hunter gatherer to agricultural societies based on evidence from south west Asia and china indicates an atecedent period of intencification and increasing sedentism. Known as the Natufian in south west Asia and the early Chinese Neolithic in China.
Forest Gardens :- A plant based food production system are the worlds oldest known Agroecosystem Forest gardens originated in prehistoric times along Jungle cloud river banks and in the wet foothills of mansoon.

      अन्तिम हिमयुग (11000 बी0सी0) के बाद शुष्क मौसम में पर्यावरण मौसमी पौधों के अनुकूल हो गया जो वर्ष पर्यन्त मर जाते थे। नृतत्वशास्त्रीय और पुरातात्विक प्रमाण यह बताते हैं कि पश्चिमी-दक्षिणी एशिया और उत्तरी अफ्रीका में लगभग 20000 बी0सी00 में जंगली अनाज पैदा होने लगा था। OHALO, ISRAEL, NATUFIAN और LEVANT की Sites से ऐसे प्रमाण प्राप्त हुए हैं। Epi-PALAeolithic और Huregra सीरिया से राई की Domestication के प्रमाण प्राप्त हुए हैं जो लगभग 10000 बी0सी0 पुराने हैं।

      यहां पर यह तथ्य स्पष्ट है कि Plant Based Food Production System यानी की रामायण में वर्णित कंदमूल, फल-फूल प्रकार के पौधों वाली कृषि व्यवस्था सुनियोजित अन्न उत्पादन वाली कृषि व्यवस्था से पुरानी है। चूंकि दक्षिणी-पश्चिमी एशिया और भारत सहित विश्व में वर्तमान प्रकार की कृषि व्यवस्था का प्रारम्भ लगभग 10000 वर्ष पुराना है तो यह निश्चित है कि रामायण में वर्णित प्रकार वाली कृषि व्यवस्था कम से 10000 वर्ष पूर्व की तो है ही।
भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि का इतिहास - सिन्धु घाटी सभ्यता से अन्नोत्पादन के प्राप्त प्रमाण 3500 से 40000पू0 के हैं। यहां से प्राप्त अन्न में गेहूं, मटर, Seasame Seed, Barley, Dates और आम के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। चीन, अफ्रीका, और पश्चिम से अन्नोत्पादन के प्राप्त प्रमाण 5000 से 80000पू0 के हैं। जहां तक भारत का प्रश्न है तो विकीपीडिया के इस अंश को देखें –

Agriculture in India – Wheat, barley and jujbe were domesticated in the Indian subcontinent by 9000 B.C., Domestication of sheep and goat soon followed. Barley and wheat cultivation along with the domestication of cattle. Primarily sheep and goat continued in Mehrgrah culture by 8000-6000 B.C.E.

      Archaeological evidence indicates that rice was a part of the Indian diet by 8000 B.C.E.

आपके सामने सक्षम साक्ष्य प्रस्तुत हैं। निष्कर्ष आप स्वतः निकाल लें। भारतीय उपमहाद्वीप में 90000पू0 में गेहूं आदि के सुनियोजित कृषि के पुरातात्विक प्रमाण प्राप्त हैं तो क्या रामायाण के घटनाक्रम को कम से 90000पू0 में रखना उचित नही होगा ? (..अनवरत्)
©तृषा’कान्त’

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बुधवार, जुलाई 11, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग - 12 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र


... वाल्मीकि रामायण जिस कालखण्ड के घटनाक्रम की गाथा का गान कर रही है: क्या उस काल में लोग खेती करना जानते थे ? यह प्रश्न रामायण के सामान्य भक्तों के लिए न केवल हास्यास्पद है अपितु उसकी श्रद्धा पर आघात भी है क्योंकि लोकास्था ऐसा मानती है कि राजा जनक को खेत में हल जोतते हुए सीता की प्राप्ति धरती के अन्दर से हुई थी और यह बात स्वंय सीता ही रामायण में तपस्वनी अनुसुइया को बताती हैं। सीता की धरती के गर्भ से स्वतः उत्पत्ति की लोकस्था एवं सिद्धान्त को मैं एवं ’’तृषाकान्त’’ भी पूर्ण श्रद्धा के साथ स्वीकार करते हैं क्योंकि प्रकृति विचित्रगर्भा है। इस लेख का सन्दर्भ मात्र तत्समय में कृषि परिचय तक सीमित है - तृषाकान्त
 12  रामायण में कृषि : भाग -1
      रामायण का कालखण्ड क्या कृषिकर्म (खेती) से परिचित था। इस तथ्य को सिद्ध करने के लिये रामायण में ’’कृषि’’ से संबंधित शब्दों का प्रयोग हुआ है उदाहरणार्थ अयो0का0 87/15 में ’’अन्नमुत्यावच’’ अयो0 का0 67/10 में ’’बीजमुष्टिः’’ 100/47 ’’कृषि गोरक्ष जीविनः’’, 112/12 ’’पंर्जन्यमिव कर्षकाः’’ पदों का प्रयोग हुआ है। अयो0 काण्ड 118 में देवि सीता तपस्वनी अनुसुइया को अपनी उत्पत्ति एवं विवाह का प्रसंग बताती है। वहां ’’तस्य लांगूलहस्तस्य कृषतः क्षेत्रमण्डलम्’’ अथवा ’’मुट्ठी के औषधि बीजों को बिखेरने का प्रसंग’’
      इसके अतिरिक्त अधिक स्पष्ट प्रसंग अरण्यकाण्ड 16/5, 16, 7 का है जहां लक्ष्मण राम से शरद ऋतु का वर्णन कर रहे हैं। श्लोक ’’5’’ में ’’पृथ्वी सस्यमालिनी’’ पद कृषिद्योतक है तो श्लोक संख्या 16 एवं 17 का का कृषि संबंधी अंशानुवाद यथावत यहां प्रस्तुत है। (अनुवाद - रामायण - गीताप्रेस गांटखपुट)
16- जौं और गेहूं के खेतों से युक्त ये बहुसंख्यक वन भाप से ढके हुए है ...।
17- ये सुनहरे रंग के धान, खजूर के फूल से आकार वाली बालों से जिनमें चावल भरे हैं, कुछ लटक गए हैं।
      उपरोक्त अथवा ऐसे ही कतिपय अन्य प्रसंग रामायण के तथ्यों को आंख बंद कर स्वीकार करने वालों के मत में रामायण में कृषि को स्वीकार करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं और इनकी आलोचना नही की जानी चाहिए। किंतु वैज्ञानिक दृष्टि से चिंतन करने पर रामायण द्वारा प्रस्तुत अन्य प्रसंगो एवं सन्दर्भों के सापेक्ष इनका विश्लेषण किया जाना चाहिए।
रामायण के यात्रा प्रसंगो में अदृश्य ’’कृषिकर्म’’:- रामायण विभिन्न पात्रों के माध्यम से तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप की यात्राएं करवाती है। इन यात्राओं के मध्य पात्रों द्वारा दृश्य नगर, ग्राम, पर्वतों, वनस्पतियों, वृक्षों, नदियों, निर्झरों एवं ऋषि मुनियों की विस्तृत सूचना उपलब्ध कराती है। किंतु आप कृषि के संबंध में कोई भी स्पष्ट संकेत नही पाते। इस संदर्भ में तीन यात्रा प्रसंग अयोध्याकाण्ड के हैं।
अयोध्या राज्य के दूतों का भरत को ननिहाल से बुलाने जाना:- अयो0 काण्ड 68/12-22 तक उस यात्रा का मार्ग का वर्णन है जिससे चलकर दूत अयोध्या से गिरिवर (भरत की ननिहाल) पहुंचते हैं।
यात्रा पथ:- अयोध्या से प्रस्थान उपरान्त मार्ग के जो चिहन वर्णित हैं तदनुसार यात्रापथ इस प्रकार हैं:-
अपरताल पर्वत - प्रलम्बगिरि के मध्य से बहने वाली मालिनी नदी का तट - हस्तिनापुर - गंगा पार कर - पश्चिम की ओर पांचाल देश - कुरूजागंल - शारदा नदी का तट - तेजाभिभवन नामक ग्राम - अभिकाल नामक ग्राम - वाह्वीक देश - गिरिव्रज नगर (भरत की ननिहाल)
मार्ग के दृश्य:- मार्ग में फूलों से सुशोभित सरोवर - निर्मल जलवाली नदियां - स्वच्छजल और भांति-भांति के पक्षियों से सेवित दिव्य नदी शरदण्डा - शरदाण्डा के पश्चिम तट पर ’’सत्योपयाचन’’ नामक वृक्ष - कुलिंगानगर - इक्षुमती नदी - तपस्वी ब्राहम्णों का दर्शन - सुदामा पर्वत - विपाशा नदी - शाल्मली वृक्ष - नदियां, पोखर, तालाब, सरोवर आदि का वर्णन है।
समालोचना:- दूत जिन वस्तुओं का दर्शन करते हैं उनका सामान्यीकरण भी है और शाल्मली वृक्ष, सत्योपयाचन वृक्ष, आदि विशिष्ट वर्णन भी हैं किंतु खेत, हल, बैल, जौ, धान, गेहूं, गन्ना आदि फसलें अथवा जोते जाते या जुते हुए खेत, काम करते किसान कहीं दिखाई नही देते। दूत वर्तमान ’’पंजाब’’ के क्षेत्र से निकलते हैं वर्तमान का कृषि प्रधान क्षेत्र किंतु उस समय दूतों को वहां भी खेत दिखाई नही देते।
भरत का यात्रापथ - गिरिव्रज (ननिहाल) से अयोध्या:- जिस मार्ग से दूत भरत को बुलाने आए हैं, भरत वापसी यात्रा उस मार्ग से तय नही करते। भरत का मार्ग है - गिरिव्रज से पूर्व दिशा की यात्रा प्रारम्भ की - सुदामा पर्वत - हादिनी नदी - सतलज नदी (शतद्रु) - ऐलहान गांव में स्थानीय नदी पार की - अपरपर्वत जनपद - शिला नामक नदी - वहां से आग्नेय कोणस्थ शल्यकर्षण देश - शिलावहा नामक नदी - चैत्ररथ वन - सरस्वती गंगा - संगम - वीरमत्स्य देश के उत्तरवर्ती देशो में प्रवेश - भारूण्डवन - कुलिंगा नदी - यमुना तट - अंशुधान ग्राम के निकट भागीरथी गंगा - प्राग्वट नामक विख्यात नगर - गंगापार - कुटिकोष्टि नदी - धर्मवर्धन ग्राम - तोरण ग्राम के दक्षिणार्ध से - जम्बूप्रस्थ - वरूथ ग्राम - उज्जिहाना नगरी - कंदव वृक्षों की बहुतायात - सर्वतीर्थ नामक ग्राम - उत्तानिका नदी - हस्तिपृष्ठ ग्राम - कुटिका नदी - लोहित्य ग्राम - कर्पावती नदी - एकसाल नगर - स्थाणुमती नदी - विनत ग्राम - गोमती नदी - कलिंग नगर - सालवन - सालवन लांघकर प्रातःकाल अयोध्या। यात्रा में लगा समय - 7 रात्रि
मार्ग के दृश्य:- उज्जिधना नगरी में कदम्ब वृक्षों की बहुतायात - अयोध्या से तत्काल पूर्व सालवन - मार्ग के दृश्यों में सामान्यीकरण है। दूतों के यात्रा पथ की तरह कोई विशिष्ट चिहन नहीं है।
समालोचना:- बिन्दु 1 की समालोचना की तरह खेत, फसलें और कृषक कहीं नही है।
      अयोध्याकाण्ड में दो यात्राएं और हैं। एक यात्रा राम करते हैं और दूसरी भरत। दोनो ही यात्राएं अयोध्या से चित्रकूट तक की हैं। राम की चित्रकूट से आगे की यात्रा लंका तक की है। इनमें भी मार्ग के गांवो, वन प्रदेशों में न समयानुकूल धान्य फसलें कहीं दिखाई देती हैं और न ही किसान, हल, बैल, खेत आदि। अरण्यकाण्ड में दो यात्राएं रावण भी करता है। यात्रा मार्ग है लंका - मारीच आश्रम और पंचवटी - लंका। खेत यहां भी नही हैं।
      इनके अतिरिक्त अयोध्याकाण्ड में महर्षि भरद्वाज भरत की सेना का स्वागत करते हैं। अपने तपोबल से नाना प्रकार के पदार्थ उत्पन्न करते हैं। इसमें जो खाद्य पदार्थ हैं उन पर दृष्टि डालें तो भोजनों के इस वर्णन में कोई वैशिष्ट्य नही है। भारतीय व्यंजन परम्परा में षटरस वाले छप्पन भोगों का वर्णन है। नाना प्रकार के अन्न, दूध आदि पदार्थो से बने पकवान हैं। उनका विशिष्ट नाम और विशिष्ट स्वाद है। किंतु मुनि भरद्वाज के ’’मीनूकार्ड’’ में किसी भी अन्न निर्मित पकवान का नाम नही है।
      अरण्यकाण्ड के सर्ग 16 श्लोक संख्या 5, 16, 17 में लक्ष्मण राम से शरद ऋतु का वर्णन करते हुए जौ, गेहूं, जड़हन, धान जिनमें चावल भरे हैं का एक साथ वर्णन करते हैं। क्या शरदऋतु में जौ, गेहूं, धान एक साथ पाया जाता है। श्लोक है -
            ’’वाष्पाच्छन्नारण्यानि यवगोधूमवन्ति च ............। 16।
            खर्जूर पुष्पाकृतिभिः शिरोभिः पूर्णतण्डुलैः
            शोभते किंचिदालम्बाः शालयः कनकप्रभाः ......... । 17।
      यह उपरोक्त वर्णन शरद ऋतु वर्णन के अन्तर्गत है। शरद ऋतु में आश्विन - कार्तिक मास शामिल है। अर्थात सित - अक्टूबर लगभग गेहूं - जौ, रबी की फसलें हैं जो दिसम्बर - जनवरी में बोई जाकर मार्च - अप्रैल में काटी जाती हैं इस समय 00 से लेकर औसतन 300-32.50 तक औसत तापमान एवं दबाब रहता है। चावल खरीफ की फसल है जो जून - जुलाई में बोई जाकर सितम्बर - अक्टूबर में काटी जाती हैं। जून में लू नामक गर्म हवायें चलने लगती हैं और तापमान 450 से भी अधिक चला जाता है। तो अक्टूबर में तापमान 220 से 250 तक गिर जाता है।  
निष्कर्ष:- उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्वीकार करने में कोई असुविधा नही होनी चाहिए कि रामायण काल के लोग हल, जुताई, खेत, सिंचाई, फसल धान से चावल व बालियों से गेहूं अलग करना आदि से परिचित नही है। संभव है किसी तरह मिटटी की ऊपरी परत को खुरचकर या खोदकर कुछ बीजों का बोना सीख गए हों। कंदमूल, फल, औषधियों आदि का जैसा वर्णन मिलता है उससे यह स्वीकार किया जा सकता है कि संभवतः कृषि के प्रारम्भिक रूप से रामायण कालीन लोग परिचित हैं।      
(….. अनवरत्)

[नोट:- इस आलेख को कदाचित इस लोकमान्यता की जगजननी मां सीता का जन्म रत्नगर्भा मां धरती की कुक्षा से हुआ है, के विरूद्ध किसी भी प्रकार का उपयोग करना विधिक अपराध होगा। लेखक स्वंय और ’’तृषाकान्त’’ इस लोकमान्यता कि मां सीता अयोनिजा थी और उनका जन्म मां धरती की कुक्षा से हुआ था के प्रति श्रद्धावनत है और पूर्ण आस्था के साथ इस लोकास्था को स्वीकार करता है।]
©तृषा’कान्त’

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बुधवार, जुलाई 04, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग - 11 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र



राम मिथ या इतिहास
 आलेखमाला    की अद्यतन कड़ियां प्रत्येक बुधवार को प्रात: 08:30 प्रकाशित होती हैं।  - तृषाकान्त 
(11)  अन्य पशु - गाय, कुत्ता आदि,

रामायण में घोड़ा (खच्चर) के अतिरिक्त कुत्ता, गाय तथा कतिपय अन्य पशुओं का भी उल्लेख है। इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण है कि अयोध्याकाण्ड में राजधानी अयोध्या में हम कुत्ते को नही देखते किंतु राजकुमार भरत एवं शत्रुध्न अपनी ननिहाल से अयोध्या वापस आ रहे हैं तो उनके नाना केकय नरेश ने जो उपहार उन्हें दिए हैं उनमें कुत्तों को भेंट में दिया जाना उल्लेखनीय है।
(अयो0का0 70/20) ’’अन्तः पुरे अतिसंवृद्धान व्याघ्रवीर्यबलोपमान
        दष्ट्रायुक्तान महाकायशुन श्रचोपपायनं ददौ’’
            अर्थात जो अन्तःपुर में पालपोसकर बड़े किए गए थे, बल और पराक्रम में बाघों के समान थे, जिनकी दाढ़ें बड़ी-बड़ी और काया विशाल थी, ऐसे बहुत से कुत्ते भी केकय नरेश ने भेंट दिए।’’ इससे यह तथ्य स्पष्ट होता है कि 
’’राजभवन में पालन पोषण हुआ है, इसका अभिप्राय है कि ये कुत्ते कार्य विशेष के लिए प्रशिक्षित हैं। अन्ततः क्या कार्य हो सकता है जो राजभवन ’’कुत्तो’’ को विशेष रूप से पाले, प्रशिक्षित करें। संभवतः सैन्य प्रयोग’’ ?
            एक अन्य तथ्य यह है कैकय देश (भरत की ननिहाल) का जो भौगोलिक वर्णन है वह व्यास नदी तक लेकर जाता है जो कश्मीर मे है। एक क्षण को वर्तमान कश्मीर को तत्कालीन ’’कैकय’’ स्वीकार कर लिया जाए तो कुत्तों का एक प्रयोग समझ में आता है। 1- चरवाहा जातियां हिंसक वन्य पशुओं से पालतू पशुओं की रक्षा के लिए आज भी उच्च हिमालय के वर्फीले क्षेत्रों में विशेष प्रकार के कुत्ते पालते हैं। 2- ध्रुवीय प्रदेशों में ’’श्लेज’’ जैसे वाहन को खीचनें के लिए कुत्तों का प्रयोग आज भी होता है। इन तथ्यों के आधार पर यह संकेत प्राप्त होता है कि राजा संभवतः अपने ’’गोष्ठों’’ (गौ समूहों) की सुरक्षा के लिए इन कुत्तों का उपयोग करता है अथवा तत्कालीन ’’कैकय’’ की भौगोलिक परिस्थितियां वर्तमान ध्रुवीय प्रदेशों की तरह हैं तो स्लेज जैसे वाहन के ये कुत्ते वाहक हैं। इस आधार पर यह दृश्य किसी ऐसे युग का प्रतीत होता है जब वर्तमान कश्मीर एवं उसका निकटवर्ती भूभाग ’’हिमयुग’’ की चपेट में हो।
कुत्तों का जैविकीय इतिहास:- %& Dog history has been studies secentry using mitchiondial D.N.A. which suggests that wolves and dogs split into different sprecies around 10000 years ago. But wheather humans had anything to do with that. No one seally knows. Recent mobna analysis (Boyko et. al.) suggests that the origin and location of dog domestication, ling thought to be in east asia is in some doult.
Dogs विकीपीडिया:- पालतू कुत्ता (canis lupus familiaris) कुत्ता (Dog) ग्रे बोल्फ की उपप्रजाति है। (Canislupus-gray wolf) कुत्ता (Dog) शब्द अर्थ Caine slrecies male  भी होता है। कुत्तों की वर्तमान श्रेणी ग्रे वोल्वस से संभवतः 15000 वर्ष पूर्व पालतू बनाई गई थी।
World Hisotry Blog – of Dr. Mihand Brown
यद्यपि कुत्तों को पालतू बनाये जाने पर विवाद है तथापि लगभग 15000 वर्ष पूर्व कुत्तों का मानव द्वारा पालतू बनाकर उपयोग किया गया। पहला कुत्ता जो पालतू बनाया होगा इस विषय पर कुछ वर्षो पूर्व एक अध्ययन हुआ था। विश्व के सैकड़ों कुत्तों का D.N.A. परीक्षण किया गया। इस अध्ययन ने यह प्रमाणित किया कि एशिया में कुत्ते को पालतू बनाये जाने के अवसर शेष विश्व से अधिक थे। इस अध्ययन ने D.N.A. परीक्षण के आधार पर यह अवधि लगभग 12000 वर्ष पूर्व मानी। इसका अध्ययन का बिन्दु यह था कि मनुष्य कुत्तों के भेड़ियों द्वारा गर्भाधान पर नियंत्रण नहीं कर पाया।
            एक तथ्य और है कि कुत्ते के पुराने फासिल्स जो पाये गए हैं वह स्विटरलैण्ड के उत्तरी भाग - जर्मनी से लगे हुए भाग में स्थित एक स्विस गुफा में Kessierich में पाये गये हैं जो 14100 वर्ष पुराने माने जाते हैं। तथ्य यह भी है कि कतिपय विद्वान भारतीय कुत्तों का पूर्वज एशियाई एवं यूरोपीय भेड़िए को मानते हैं न कि नार्थ अमेरिकी भेड़िए को जर्मनी के Bonn-oxerkassel नामक स्थान पर 14000 वर्ष पुराने फासिल्स भी पाये गये हैं। विकास क्रम में भेड़िए नस्ल के इन पालतू कुत्तों के जबड़े दांत की तुलना में पहले सिकुड़ गए और दांत भी छोटे हो गए।
It is thought about 8000 years ago, was the first attempt by humans to Actually breed their dogs for specific traits. D.N.A. Studies have shown that our modern day dogs are not ancestors to the North America gray wolf. Our dogs have wolf ancestors with inhatrifed Europe and Asia.
कुत्तों से संबंधित इतिहास के एक अन्य शोधकर्ता Xiaomin & Wang और Richera H-Tedford इन्होने अपना अध्ययन काफी व्यापक स्तर पर अमेरिकन म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री एवं अन्य संस्थानों के सहयोग से किया है। “Dogs their fossils relatives and their history”. 2008 By Xiamoung Wang and Richerd H. Tedford – Publisher – Columbia Univeristy Press.
2922461
By 40 million years ago However the first clearly identificable member of the dog family it self the canidae
विज्ञानियों की दृष्टि से भारतीय उपमहाद्वीप प्राणि जगत की दृष्टि से भी सम्पन्न रहा है। भारत में विश्व के 4 प्रतिशत से 11 प्रतिशत तक विभिन्न प्राणि वर्गो जैसे मछलियां, चिड़ियां पशु जगत के पुरायुगीन साक्ष्य अथवा अवशेष पाये गये हैं। शिवालिक पर्वत श्रेणी में मस्टूडूनस, हिप्पोपोटोमस, राइनोसोरसख् शिवेथेरियम, जिराफ, घोड़ा, ऊँट, हिरण, पिग, चिंपाजी, बैबून, लंगूर, चीता, शेर, तेंदुआ आदि के साथ भेड़िया और Dholes के साक्ष्य भी पाये गये हैं। अन्य विभिन्न मैमल्स के प्रमाण भी मिले हैं। उल्लेखनीय है कि भेडिया और Dholes भारतीय कुत्ते के पूर्वज हैं।

जिस तरह के कुत्ते की रामायण के इस श्लोक के वर्णन अनुसार एक काल्पनिक चित्र हो सकता है उसका प्रस्तुत चित्र से मिलान करें। यह चित्र ग्पंवउपदह ॅंदह और त्पबीमत दृ भ् दृ ज्मकवितमक की 2008 में कोलम्बिया विश्वविद्यालय प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक Xiaoming Wang vkSj Richer – H – Tedfored के इण्टरनेट पर उपलब्ध विज्ञापन से ग्रहण किया गया है। श्री बांग एवं अन्य शोधकर्ताओं के शोध के आधार पर यह तथ्य उपलब्ध हैं कि जो 15000 वर्ष पालतू बनाया जाना प्रारम्भ कर दिए गए थे। 12000 वर्ष पूर्व तक इनकी मादाओं का भेड़ियों से प्रजनन करना मनुष्य नियंत्रित नही कर पाया था। ऐसा लगता है कि 15000 से 12000 वर्ष पूर्व के कुत्ते पालतू भेड़िए ही थे।  लगभग 8000 वर्ष पूर्व पालतू कुत्तों की कई प्रजातियां विकसित कर ली गईं। कैकय नरेश द्वारा जो कुत्ते भरत को भेंट किए गए हैं वह संभवतः इन्ही पालतू बनाई गई नस्लों के आव्रजन से प्राप्त किए गए होंगे।
            इन तथ्यों से प्राथमिक साक्ष्य के रूप में यह तो स्वीकार किया ही जा सकता है कि कैकय नरेश द्वारा भरत को भेंट किए कुत्ते कम से कम पूर्णतः पालतू बना ली गई नस्ल के तो नहीं। संभवतः यह वही नस्ल है जो पालतू हो जाने के बाबजूद वन्य भेड़ियों के संसर्ग से प्रजनन कर रही है। रामायण के संदर्भ में यह कतिपय जानकारियां आपके समक्ष हैं जो आपको एक सशक्त आधार देती हैं कि रामायण में वर्णित भरत को उपहार में प्राप्त कुत्ते को आप किस कालखण्ड में रखना उचित मानते हैं। मेरे विचार से चूंकि तक कुत्ते को पूर्णत पालतू बना लिया गया था और वन्य भेड़िए से उसके प्रजनन पर नियंत्रण पा लिया गया था। अतः भरत को उपहार में प्राप्त कुत्ते इस समय से पूर्व के होने चाहिए क्योंकि वर्णित श्लोक के अनुसार कुत्तों को जो काल्पनिक चित्र बनता है उसमें जंगली भेड़िए के अंश उग्र रूप में प्रदर्शित हैं। अतः उसे वर्ष पूर्व के कालखण्ड में रखना उचित होगा।
(..अनवरत्)
©तृषा’कान्त’

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