... आप रामायणकालीन व्यापार के विषय में क्या अनुमान लगाना चाहेंगे। व्यापार की प्रवृत्ति स्थानीय है ? स्वरूप सरल और प्रारम्भिक है ? यदि हम इस तथ्य को स्वीकार करें तो सामान्यतः इस तरह का व्यापार का संचालन अतीत में वस्तुओं के ’’आदान-प्रदान’’ की विधि से संचालित होता रहा है। ऐसे में ’’निष्क और रूक्म’’ जो चाहें अलग-अलग हों अथवा एक। निश्चित ही बड़ी मुद्राएं हैं क्योंकि इन्हें स्वर्ण निर्मित बताया गया है, संदेह उत्पन्न करती है। एक प्रश्न और भी है क्या व्यापार मात्र बड़ी मुद्रा से संभव है। विशेषतः व्यापार की जो प्रवृत्ति रामायण प्रदर्शित कर रही है, उस तरह का व्यापार और फिर किसी भी छोटी ’’मुद्रा’’ का परिचय रामायण हमें नही देती - तृषाकान्त
(14) रामायण में व्यापार और मुद्राएं
रामायण महाकाव्य है जिसे हिन्दू व्यवस्था इतिहास स्वीकार करती है। इस
महाकाव्य में क्या व्यापार और मुद्रा के चलन का प्रयोग है ? अयोध्या काण्ड सर्ग 170/47 में रत्नपरिपूरित
दुकानों का उल्लेख है। अयो0का0 17/3 से 6 में जो व्यापार वाणिज्य की सामग्री उल्लिखित है, उस पर ध्यान दें -
चन्दन, अगरू एवं अन्य सुगंध ’’क्षौम कौशाम्बर’’ (अलसी या सन तथा रेशम निर्मित वस्त्र) अबिद्ध मोती, उत्तम स्फटिक, उस राजपथ की शोभा
बढ़ा रहे थे। दधि, अक्षत, हविष्य, लावा, धूप, अगरू चन्दन, पुष्पहार आदि।’’
यदि हम मुद्रा की बात करें तो अयो0 काण्ड 31/37 में वनगमन प्रेरित राम द्वारा 1000 निष्क वशिष्ठ पुत्र सुयज्ञ को देने का प्रसंग आता है। अन्यत्र इसी
काण्ड में सचिव को भी 1000 निष्क देने का प्रसंग आता है।
राम अयोध्या से वन जाते समय कौशल देश की सीमा पार करते हैं जो सामन्त
शासित राज्य है। (अयो0का0/50/11) इसके बाद श्रंगवेरपुर के निषादराज गुह राम से भेंट करते हैं। फिर राम
नाव से गंगा पार कर वत्स देश (प्रयाग) पहुंचते हैं। यहां पर राम आखेट करते हैं।
वत्स के बाद भरद्वाज आश्रम और फिर चित्रकूट पहुंच जाते हैं। यह आश्रम क्षेत्र है।
अतः व्यापार का कोई प्रश्न ही नही।
प्रश्न:- व्यापार में वस्तुएं एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जायी
जायेंगी। उनको बेंचा जायेगा और वस्तुओं के बदले में विक्रेता या तो अन्य वस्तुएं
क्रेता से प्राप्त करेगा या धन प्राप्त करेगा। चूंकि ’निष्क’ नामक स्वर्ण मुद्रा
का प्रचलन देख रहे हैं तो मुद्रा ही व्यापार का माध्यम होना चाहिए। किंतु अभी तक ’राम’ को मार्ग में कहीं
व्यापारिक काफिले क्यों नही मिले हैं।
अयोध्या काण्ड सर्ग 68 से एक अन्य यात्रा प्रारम्भ होती है। अयोध्या के राजदूत भरत की
ननिहाल कैकय देश जा रहे हैं मार्ग में वे हस्तिनापुर में गंगा पार कर वहां
सेपश्चिम पांचाल देश और कुरूजांगल प्रदेश के बीच से आगे बढ़े। मार्ग में उन्हें
तेजोभिभवन एवं अभिकाल नामक गांवो को पार करते हुए वह कैकय देश पहुंच गए।
प्रश्न/टिप्पणी:- अयोध्या के राजदूतों के इस मार्ग में कोई वाणिज्यिक
जानकारी नही मिलती है। न ही कोई व्यापारिक काफिला इन्हें मार्ग में मिलता है। ये
मार्ग में कुछ क्रय भी नहीं करते हैं जिससे ’मुद्रा’ प्रयोग की जानकारी प्राप्त हो।
अब हम भरत की कैकय के अयोध्या तक की यात्रा देखते हैं। अयो0का0/70/21 में ’’रूक्मनिष्क सहस्त्रे
द्वे’’ के रूप में हम दो सहस्त्र ’रूक्म निष्क’ स्वर्णमुद्राएं भरत के नाना द्वारा अन्य उपहारों के साथ भेंट किए जाते
देखते हैं। इससे पूर्व हम राम द्वारा सुयज्ञ को 1000 निष्क भेंट किए जाते देख चुके हैं। किंतु यहां
पर ’’रूक्म निष्क’’ का प्रयोग हुआ है। ये एक ही है। अथवा पृथक-पृथक इसकी चर्चा हम आगे करेंगे।
अयो0का/सर्ग 71 भरत कैकय की राजधानी राजगृह से निकलकर पूर्व दिशा की ओर चलते हैं। इस
मार्ग की चर्चा हम कृषि संबंधी खण्ड भाग 12 में कर चुके हैं। अतः पुनरावृत्ति करना यहां उचित नहीं होगा। भरत
अपनी सेना सहित 7 रात्रियां मार्ग में व्यतीत कर अयोध्या पहुंचते हैं। मार्ग में वे
जिन नगर ग्रामों को पार करते हैं उनके नाम क्रमानुसार (गिरिव्रज - अयोध्या) इस
प्रकार हैं - ऐलधान ग्राम - अपरपर्वत जनपद - शल्यकर्षण देश - वीरमत्स्य देश -
उत्तरवर्ती अन्य देश - अंशुधान ग्राम - धर्मवर्धन ग्राम - तोरण ग्राम -
जम्बूप्रस्थ - वरूथ ग्राम - उज्जिहाना नगरी - सर्वतीर्थ ग्राम - हस्तिपृष्ठ ग्राम
- लोहित्य ग्राम - एकसाल नगरी - विनत ग्राम - कलिंग नगर - और इसके बाद अयोध्या।
टिप्पणी/प्रश्न:- इस सम्पूर्ण यात्रा
मार्ग में ग्रामों - नगरों का आधिक्य है किंतु रामायणकार न तो स्थानीय स्तर पर किसी
व्यापारिक गतिविधि की जानकारी देता है और न ही सम्पूर्ण मार्ग में व्यापारिक
काफिलों से भेंट करवाता है। मुद्रा के प्रयोग का भी कोई अवसर अब तक सुलभ नहीं है।
अयोध्या के बाजारों का दृश्य अब तक आपने जो देखा है उसमें वाणिज्यिक -
व्यापारिक गतिविधियों की जीवन्तता कितनी है इसका निर्णय आप पर ही छोड़ता हूँ।
व्यापारिक गतिविधियों की दृष्टि से अयोध्या काण्ड ही महत्वपूर्ण है।
अरण्य एवं सुन्दरकाण्ड वन्य जीवन है। जबकि किनिष्कंधा एवं युद्ध काण्ड में नगरीय
जीवन की हल्की सी झलक अवश्य मिलती है किंतु अधिकांश वातावरण युद्ध का ही है। हाँ
इतना अवश्य है कि युद्धकाल प्रायः व्यापारिक समूहों के लिए सदैव ही व्यापार और
लाभार्जन का एक अवसर होता है किंतु किष्किन्धा अथवा युद्धकाण्ड हमें ऐसे
व्यापारियों अथवा व्यापारी समूहों से कोई परिचय नहीं कराता।
अयोध्याकाण्ड के सर्ग 80 एवं 83 के आधार पर नीचे हम व्यापार कर्म की एक तालिका बना सकते हैं।
अयोध्याकाण्ड/सर्ग-80/श्लोक संख्या 1-22 सम्पूर्ण सर्ग
ध्यान रहे कि ये सभी सेवा कर्मी हैं। किंतु ये सभी कर्म नागरिक उपयोग
के भी हैं। चटाई निर्माता अथवा चर्मकर्म स्थानीय प्रवृत्ति के अतिशय प्रारम्भिक स्तर
के व्यापार कर्म स्वीकार किए जा सकते हैं।
1- भूमि प्रदेशज्ञ - भूमि के जानकार
2- सूत्रकर्म विशारद -
3- यंत्र कोविद - भूमि
खोदने वाले
4- मार्ग रक्षक - मार्ग
के रक्षक
5- सूपकार - चटाई
निर्माता/सूप निर्माता
6- सुधाकार - पुताई/चूने
का काम करने वाले
7- वंशचर्मकृत - चमड़े
का कार्य करने वाले
8- खनक - खुदाई करने वाले
9- यंत्रक - सुरंग निर्माता
10- वर्धक -
11- वृक्षतक्षक - वृक्ष
काटने वाले
अयोध्या काण्ड सर्ग 83 श्लोक 12-16
अन्य सूची भी हैं, जिससे व्यापार की प्रवृत्ति पर प्रकाश पड़ता है।
1- मणिकार - मणियों को चमकाने वाला
2- कुम्भकार - कुम्हार - मिटटी के बर्तन बनाने वाला
3- सूत्रकर्म विशेषज्ञ - पीछे
देख चुके हैं। जुलाहा मान सकते हैं
4- शस्त्रोपजीविन - सैन्यकर्मी अथवा शस्त्र निर्माता
5- मायूरक - मोरपंख के पंखे आदि बनाने वाले
6- क्राकचिक - आरे से लकड़ी चीरने वाला
7- वेद्यक - छेद करने वाले
8- रोचक - दीवारों
आदि को अलंकृत करने वाले
9- दन्तकार - हाथी दांत आदि के कारीगर
10- सुधाकार - चूना आदि के निर्माण या पुताई कर्मी
11- गंधोपजीवी - इत्र आदि के निर्माता/विक्रेता
12- सुवर्णकार - सुनार
13- कम्बल कारका - कम्बल
आदि बनाने वाले
14- स्नापष्णोकः - गरम जल में नहलाने वाले कहार
15- वैद्य - चिकित्सक
16- धूपकः - धूप आदि देने वाले/मशाल आदि जलाने वाले
17- गोण्डिक - मद्य विक्रेता
18- रजक - धोबी
19- तन्तुवाय - दर्जी
20- ग्रामघोण महत्तर - ग्रामों
गौशालाओं के महतो
21- शैलूण - नट
22- कैवतर्क - केवट
आप रामायणकालीन व्यापार के विषय में क्या अनुमान लगाना चाहेंगे।
व्यापार की प्रवृत्ति स्थानीय है ? स्वरूप सरल और प्रारम्भिक है ?
यदि हम इस तथ्य को स्वीकार करें तो सामान्यतः इस
तरह का व्यापार का संचालन अतीत में वस्तुओं के ’’आदान-प्रदान’’
की विधि से संचालित होता रहा है। ऐसे में ’’निष्क और रूक्म’’ जो चाहें अलग-अलग
हों अथवा एक। निश्चित ही बड़ी मुद्राएं हैं क्योंकि इन्हें स्वर्ण निर्मित बताया
गया है, संदेह उत्पन्न करती है। एक प्रश्न और भी है क्या व्यापार मात्र बड़ी
मुद्रा से संभव है। विशेषतः व्यापार की जो प्रवृत्ति रामायण प्रदर्शित कर रही है, उस तरह का व्यापार
और फिर किसी भी छोटी ’’मुद्रा’’ का परिचय रामायण हमें नही देती।
निष्क:- वेद में ’हिरण्य’ (स्वर्ण निर्मित
आभूषण था जो बाद में मुद्रा के रूप में प्रयोग होने लगा) उत्तरवैदिक काल में ’निष्क’ नियमित स्वर्णमुद्रा
न होकर धातु का एक ढेर था। उत्तरवैदिक काल में शतमान 100 रत्ती से पदार्थ
शतमान 118 शतमान प्रचलित था। 320 रत्ती स्वर्ण कहा जाता था। वैदिक काल लगभग 1000 ई0पू0 तक नियमित मुद्रा
का प्रचलन इतिहास कार नहीं मानते। उत्तर वैदिक काल में निष्क-शतमान, पाद, कृष्णवल, आदि मुद्रा की अन्य
इकाईयां भी प्रचलन में थी।
रूक्म:- ?
कृपया पाठक बंधुओं पर यदि कोई जानकारी हो तो
उपलब्ध करायें।
यदि अब तक के लेख का विश्लेषण करें तो संभवतः आप कुछ बिन्दुओं पर सहमत
हों:-
1-
व्यापार स्थानीय प्रवृत्ति का है और अतिशय
प्रारम्भिक स्तर का है।
2-
मुद्रा के प्रयोग को स्वीकार करना अतिशय कठिन एवं
दुष्कर है।
3-
संभवतः व्यापार का माध्यम सेवा अथवा वस्तुओं का
आदान-प्रदान है। (..... अनवरत्)
©तृषा’कान्त’