बुधवार, जून 20, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग - 10 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र


राम मिथ या इतिहास आलेखमाला    की अद्यतन कड़ियां प्रत्येक बुधवार को प्रात: 08:30 प्रकाशित होती हैं।  - तृषाकान्त 
(10)  रामायण में हाथी

रामायण में जिस प्रकार ’’अश्व’’ एवं गर्दभ का विवरण प्राप्त है उसी प्रकार गज या हाथी का विवरण भी उपलब्ध है। अपितु ’’अश्व’’ की तुलना में हाथी के विवरण में यह विशेष बात है कि राम के हाथी का नाम ’’शत्रुंज्जय उल्लिखित है (.......) वही दण्डकारण्य में वन्य हाथी का विवरण भी उपलब्ध है। वन्य अश्व रामायण में दिखाई नही देता जबकि हाथी का वन्य रूप उपलब्ध है। अश्व की उत्पत्ति जहां नार्थ अमेरिका से मानी जाती वही हाथी एशियाई और भारत भूमि का प्राणी है। यह तथ्य भी ध्यान में रखने योग्य है। रामायण के दण्डाकरण्य चिहनांकन वाले क्षेत्र में हाथी के फासिल्स पाए गए हैं जो अनुमानतः 32000 वर्ष प्राचीन हैं। यह तथ्य रामायण में अश्व की तुलना में हाथी की संभाव्यता को अधिक सुलभ बनाते हैं। अतः मेरे विचार से प्राथमिक साक्ष्य इस तथ्य का समर्थन करते हैं कि रामायण काल में हाथी की उपलब्धता को स्वीकार कर लिया जाए।

रामायण हाथी के विषय में कतिपय विशेष तथ्य उल्लिखित करती है जो महत्वपूर्ण है। रामायण सुन्दरकाण्ड ’’श्लोक 28’’ पर जरा ध्यान दें –

’’वारणैश्च चर्तुदन्तैः श्रवेताभ्रनिचयोपमैः’’

श्वेत बादलों की घटा के समान दिखने वाले ’’वारणैश्च चतुदर्न्तेः अर्थात चार दांतो वाले हाथी।’’ हनुमान इन हाथियों को रावण के निजी भवन में प्रवेश करते समय देखते हैं। सुन्दरकाण्ड में राजधानी लंका में सीता को खोजते हुए हनुमान को अन्यत्र चार दांत वाले हाथी दिखाई नही देते। इसका अभिप्राय यह मान सकते हैं कि हाथियों की यह नस्ल दुर्लभ है और इसीलिए मात्र सम्राट रावण की सेवा में है।

वर्तमान परिदृश्य में इस तथ्य का परीक्षण करें तो स्पष्ट है कि उपलब्ध हाथी दो दांतो वाला है और रामायण इसका भी उल्लेख करती है। यह भी तथ्य है कि ’’प्राणि’’ इतिहास में चार दांत वाले हाथी मैमथ की उपलब्धता मौजूद है अतः इसे मात्र कवि का काव्य चमत्कार नही माना जा सकता। अतः चार दांत वाले हाथी को एक तथ्य रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। (सुन्दरकाण्ड - सर्ग 6 श्लोक 34)

हाथी अथवा मैमथ के विषय में कुछ तथ्य:- वर्तमान में प्राप्त हाथियों के मात्र ऊपरी जबड़े में दांत होते हैं। रामायण कालीन चार दांत वाला हाथी तभी सम्भव है जब उसके नीचे के जबड़े में भी दो दांत हो यानी दो दांत ऊपर के जबड़े में और दो दांत नीचे के जबड़े में।
           
विकीपीडिया - (Elephant) बताती है कि - Tusks in the lower jaw are also second incisor. These grew our large in Deinotherium and some Mastodoons But in modern elephants they disappear early without erupting.

            By time of first GOMPHOTHERIUM the animal developed tusks on both jaws, upper and lower. Here the lineage seemd to split with the DINOTHORIUm spreciapesing in tusks on the lower jaws. While mammoths and mastodons like modern elephants develop tusks only on the top jaws.

आप सोचेंगे कि ये गोम्फोथेरियम् मैमथ, मस्टोडन और डाइनोथोरिम क्या बला है और रामायण के पात्रों के काल निर्धारण में इनका क्या उपयोग है।
·        Sepcies, Genus, Family, Order, Class phylum and Kingdom (हाथी से संबंधित जैविकीय जानकारियां)
·        Kingdeom = Amimalia
·        Phylum = Chordata
·        Class = Mammalta (Mammals)
·        Sub Class = Eutheria (Placental Mammals)
·        Family = Gomphotheiidae – Mammutidae
·        Genus = Mammut (Mastodons)
·        (From = Elephant Evolution – History of the order prabosciedae : From)
·        The Ameraican mastodon (Mammat americanum) the most recent member of the family lived from about 3.7 million years ago until it became extinct about 10000 years B.C.E. It is known from fossils found ranging from present day Alaska and New England, in the north of florida Suthern Calfornia and as far as South Honduras.
·        They are generally reported as having disappeard from North America about 12700 years ago.
सामान्यतः मैमथ 20000पू0 तक पाये जाते रहे हैं किंतु चार दांतो वाले मैमथ के परिवार का अन्त लगभग 100000पू0 में हो गया था। इस समय तक न केवल वर्तमान हाथी वर्ग विकसित हो चुका था अपितु दो दांत वाले विशालकाय मैमथ भी जीवित थे। रामायण तीन दांत के हाथी का उल्लेख हनुमान के द्वारा सीता की खोज के प्रसंग में लंका में सीता की खोज के दौरान करती है। ये तीनों दांतो वाला हाथी संभवत चार दांतो वाले गोम्फोथेरियम - मैमथ - मैस्टोडून परिवार का सदस्य ही है जिसका एक दांत विचित्रता प्रदर्शन के हेतु सम्राट रावण द्वारा या तो उखड़वा दिया गया है अथवा किसी कारण से टूट गया है।
समय:- ये तथ्य भी रामायण के पात्रों को लगभग 100000पू0 से 127000पू0 तक जीवन्त करने के साक्ष्य उपलब्ध करा रहे हैं।
(..अनवरत्)
©तृषा’कान्त’

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रविवार, जून 17, 2012

ओ पिता ! ..... [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'


फादर्स डे पर विशेष - पिता अर्थात एक अमिट अस्तित्व .. एक वजूद जो अपने स्वप्नों .. अपनी आकांक्षाओं को सन्तति के उज्ज्वल भाविष्य के लिये प्रसन्नता के साथ त्याग देता है .. अखिल विश्व के ऎसे सभी पिताओं को समर्पित अनुभूति पर मेरी एक रचना.. नमन - तृषाकान्त
ओ पिता !
लगा है एक युग मुझे,
पहचानने में तुम्हें

माँ होती है धरती,
गेहूँ अथवा जौ
बोया गया किस खेत में,
कोई अन्तर नहीं पडता,
हृदय पोषित तत्व से
उगती है जो फसल,
नाम क्या.. पहचान क्या,
फिर कौन हूँ मैं ..
वह तो है बोया बीज,
मैं जो भी हूँ वह हो तुम

हे पिता !
पीड़ा दी है
बहुत तुम्हें ..
स्वयं को त्यागी..
महान और वीतरागी,
सिद्ध करने के दर्प में,
क्षमा याची .. ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..
सब कुछ भूल,
आश्वासन बचपन का,
आज फिर
चिपट कर लिपट कर
रोना चाहता हूं ..
और पुकारता हूं..

हे पिता !
लगा है एक युग मुझे
पहचानने में .. तुम्हें,
दर्द से आकुल
सीने से उठता ज्वार
फूट पड़ता है आंखों से,
और तभी
केवड़े की गंध से
भर जाता है मेरा कमरा,
खिड़की से प्रवेश करता है
हवा का एक झोंका

मेरे आंसू सुखाने लगता है.
©तृषा’कान्त’

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बुधवार, जून 13, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग - 9 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र


राम मिथ या इतिहास आलेखमाला    की अद्यतन कड़ियां प्रत्येक बुधवार को प्रात: 08:30 प्रकाशित होती हैं।  - तृषाकान्त 
(09)  रावण का प्रेतकर्म

(अब तक श्रृंखला के इस  भाग के अन्तर्गत हमने इस शव निस्तारण पद्धति अथवा मृतकर्म संस्कार को काल निर्धारण हेतु विचार किया। मृतक के शव के साथ - साथ पशु अंगो को दफन किए जाने के आधार पर आगे बढ़ते हुए हमने रामायण के राक्षसों की कर्मभूमि ’’दण्डकारण्य’’ की पहचान स्थापित की। साथ ही ’’राक्षसों’’ को भी चिहिन्त करने का काम किया। अब आगे पढ़े) –

’’दण्डकारण्य’’ ही राक्षसों की वह कर्म भूमि है जहां से हम अपनी खोज यात्रा आगे बढ़ाते हैं। (दण्डकारण्य के विषय में अधिक जानने के लिए पढ़े - आदिवासी बस्तर का वृहद इतिहास - रामायण का पुरातत्व द्वारा डा0 हीरालाल शुक्ल) यद्यपि राक्षसों के विषय में डॉ0 बुल्के के मत से हम परिचित हो चुके हैं किंतु डा0 शुक्ल ने इस विषय पर विस्तृत साक्ष्यों सहित प्रकाश डाला है। डा0 शुक्ल गोंडो को ’’राक्षस’’ सिद्ध करने के सिद्धान्त का खण्डन करते हैं और रामायणकालीन लंका को गोदावरी के डेल्टे (आन्ध्रप्रदेश) में सिद्ध करने के उपरान्त  राक्षसों के संबंध में अपना मत इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं - ’’राक्षस’’ मध्यवर्ती द्रविण परिवार के मूल पुरूष रहे होंगे। ’’प्राक मध्यवर्ती द्रविण’’ जन या आन्ध्रजन को रामायण का राक्षस माना जा सकता है। श्री शुक्ल ऐसा संकेत देते हैं कि - ’’सातवाहन नृपति क्या राक्षवसंश प्रसूत थे ? (विस्तार से पढे़ ’’रामायण का पुरातत्व’’)

राक्षस गोंड आदिवासी हो अथवा ऐतरेय ब्राहम्ण और पुराणों के ’’आन्ध्र’’। किंतु यह स्वीकृत तथ्य है कि दण्डकारण्य क्षेत्र में इनका आव्रजन मार्ग दक्षिण ही रहा है। यही संकेत रामायण भी देती है। यहां पर यह स्पष्ट करना भी प्रासंगिक है कि गोंड आदिवासियों अथवा आन्ध्रों में से जिसे भी राक्षस माना जाए उनकी राजवंशीय परम्परा के सूत्र आगे भी प्राप्त होते हैं जैसे आंध्रवंश के सातवाहन नरेश एवं गोंडो में 15130 से 15410 तक गढ़ा मण्डला का राजवंश संग्रामशाहि (हीरलाल शुक्ल - पूर्वोक्त)

गोदावरी नदी के घाटी क्षेत्र की पुरातात्विक खोज:- कर्नाटक के नरिसंहपुरा के कावेरी बेसिन के उत्खनन से शवगृहों में जो सामग्री प्राप्त हुई है, उसके विषय में यह उल्लेख दृष्टव्य है - Upper Kaberi Basin has established …….. a date claming from the part of the first half of the second millennium B.C. ……… The systematic ground excavation compressing trivial ground remnants, potteries, graffiti, stone implements, metal objects, leads and bangles, animal remains human scenes wood remains etc”. (An Authoritative report on the excavations at T. Narsipur “by prof. M. Seshdre Director of Archeology of mysore publishers of in 1971 provides a detailed insight into the Ancient pre-historic cebilization learnings Ancient pre-historic cerrlization learnings of T. Narsipura and its surroundings)

यदि हम इन तथ्यों का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि गोदावरी, कावेरी बेसिन के पुरातात्विक शवगृहों से धातु, पत्थर, लकड़ी के औजार, मनके, मानव एवं पशु अंश प्राप्त हुए हैं। ये तथ्य रामायण एवं गृहसूत्रों में शव को समर्पित वस्तुओं से मेल खाती है। नरसिंहपुरा के उत्खन्न से प्राप्त पूर्ववत अवशेषों का समय First half of second millennium B.C. प्रो0 शेषाद्री द्वारा माना गया है। यहां यह स्पष्ट कर दूं कि रावण ’’राक्षसाधिपतिः’’ अवश्य है किंतु वह स्वंय राक्षस हैं ऐसा रामायण पुष्टं नहीं करती। संभव है राजा होने के कारण रावण ने अपनी मूल परम्पराओं के साथ प्रजाजन की परम्पराएं भी स्वीकार करके एक मिश्रित परम्परा अपना ली हो।

उपरोक्त साक्ष्यों के आधार पर निर्विवाद रूप से मात्र यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि कावेरी, गोदावरी वेसिन का यह क्षेत्र दीर्घकालीन अतीत से मानवीय सभ्यताओं के विकास के अनुकूल रहा है।

यद्यपि जो साक्ष्य अपनी सीमाओं के अन्तर्गत मैं खोज पाया हूं उनके आधार पर स्पष्टतया किसी तिथ की ओर इंग्ति करना असंभव है साथ यह कहना भी असंभव है कि ’’रावण - प्रेतकर्म’’ शीर्षक मैं जिस तरह की ’’शव सामग्री’’ की साक्ष्य के रूप में अपेक्षा है, ऐसा विशिष्ट प्रकृति की ’’शव सामग्री’’ किस स्थान विशेष से प्राप्त हुई है। किंतु प्रस्तुत साक्ष्य आश्वलायन गृह सूत्र एवं रामायण के आधार वाली ’’शव सामग्री’’ के प्राप्त होने की घोषणा तो करते ही हैं। फिर भी प्रो0 शेषाद्री द्वारा निर्धारित समय अति दूरस्थ है।

यहां पर एक तथ्य और उद्धृत करना समीचीन होगा कि ’’अश्व’’ श्रृंखला के साक्ष्य 10000 बी0सी0 पुराने घटनाक्रम का उल्लेख करते हैं। भारत में Hunting Gathering Age हम 100000 से 10000 बी0सी0 पुरानी मानी जाती है। इस युग को तीन चरणों में बांटा जाता है प्रथम चरण - 100000 बी0सी0, द्वितीय चरण - 100000 से 40000 बी0सी, तृतीय चरण 40000 से 10000 बी0सी0। कृष्णा गोदावरी बेसिन के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, मिर्जापुर, वाराणसी, जौनपुर में ऐसी 200 से भी अधिक पुरातात्विक साइट्स पायी गयी हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि गंगा घाटी के इस क्षेत्र में 8000 से 90000पू0 में मानवीय गतिविधियां अत्यन्त तीव्र हो गयी थीं।
अतः प्रथम दृष्टया यह स्वीकार किये जाने में कोई आपत्ति नही होनी चाहिए कि राम एवं उनके समकक्षों के लिए एक समयावधि कम से कम 8000 से 90000पू0 रखी जा सकती है।
(अनवरत)
 ©तृषा’कान्त’

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