सोमवार, फरवरी 27, 2012

मेरा आदर्श भी वही है ... तुम नहीं राम ..!! [कविता] - रश्मि भारद्वाज


हे राम !
जानते हो तुमसे
क्यों नहीं मांगी
किसी ने अग्निपरीक्षा.....!!??
क्योंकि ये अगाध प्रेम था किसी का
जो नहीं देख सकता था खड़ा
तुम्हें प्रश्नो के दायरे में
जो नहीं चाहता था
खंडित हो तुम्हारी छवि
मर्यादा पुरुषोतम की
इतना निश्चल प्रेम
ईश्वर बना दिया तुम्हें ....!!!!
और ये कैसा प्रेम तुम्हारा
जिसे थी प्रमाण की दरकार
दुनिया के लिए.....!!!
ये कैसा ईश्वरत्व तुम्हारा....!!??
जिसे बचाने के लिए
कर गए परित्याग भी तुम
हमेशा के लिए ...........
साबित कर दिए दुनिया के इल्ज़ाम
वह भी तब
जब सिर्फ तुम्हारी जरूरत थी उसे
तब कैसे पाओगे
तुम भी वह प्रेम......!!!
जो तुम्हारा था कभी
उसे तो जाना ही था
धरती के गर्भ में
आज से सदियों पहले ही
कर गया कोई
अपनी अस्मिता को
बचाने की पहल
प्रेम में होने के बाद भी .......
मेरा आदर्श भी वही है राम
तुम नहीं .................!!

 रश्मि भारद्वाज
©तृषा’कान्त’

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बृहस्पतिवार, फरवरी 16, 2012

सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है ...... [कविता] - अमिता मिश्र 'नीर'

 सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
केसरी जलधि नभ नील बना
मेरे मन की नैया जिसमें
क्यूं थिरक थिरक रह जाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

चलने का अन्त नहीं होता
फिर भी चलना पडता हमको
सुख दुख है इस जग की छाया
हमको तो यही बताती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कितने ही जीवन के पथ में
हरिताभ मरूस्थल भी आये
सूरज डूब गया लेकिन
चन्द्रोदय की कुछ आस नहीं
लो पीडा कण बरसाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कल्पना कुसुम क्या 'नीर' हुये
हैं सत्य कभी मन उपवन के
कुछ यक्ष प्रश्न इस जीवन में
युग युग से छोडे ज़ाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
©तृषा’कान्त’

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शुक्रवार, फरवरी 03, 2012

सखी री ! देखो आया वसन्त... [कविता] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सखी री !
देखो आया वसन्त
बौराई पछुआ को लेकर
मदमाती अँगड़ाई लेकर
तन-मन टूटे मदमस्त अंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन
सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया वसन्त
©तृषा’कान्त’

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