... वाल्मीकि रामायण जिस कालखण्ड के घटनाक्रम की गाथा का गान कर रही है: क्या उस काल में लोग खेती करना जानते थे ? यह प्रश्न रामायण के सामान्य भक्तों के लिए न केवल हास्यास्पद है अपितु उसकी श्रद्धा पर आघात भी है क्योंकि लोकास्था ऐसा मानती है कि राजा जनक को खेत में हल जोतते हुए सीता की प्राप्ति धरती के अन्दर से हुई थी और यह बात स्वंय सीता ही रामायण में तपस्वनी अनुसुइया को बताती हैं। सीता की धरती के गर्भ से स्वतः उत्पत्ति की लोकस्था एवं सिद्धान्त को मैं एवं ’’तृषाकान्त’’ भी पूर्ण श्रद्धा के साथ स्वीकार करते हैं क्योंकि प्रकृति विचित्रगर्भा है। इस लेख का सन्दर्भ मात्र तत्समय में कृषि परिचय तक सीमित है - तृषाकान्त
12 रामायण में कृषि : भाग -1
रामायण का कालखण्ड क्या कृषिकर्म (खेती) से
परिचित था। इस तथ्य को सिद्ध करने के लिये रामायण में ’’कृषि’’ से
संबंधित शब्दों का प्रयोग हुआ है उदाहरणार्थ अयो0का0 87/15 में ’’अन्नमुत्यावच’’ अयो0
का0 67/10 में ’’बीजमुष्टिः’’
100/47 ’’कृषि गोरक्ष जीविनः’’, 112/12 ’’पंर्जन्यमिव
कर्षकाः’’ पदों का प्रयोग हुआ है। अयो0 काण्ड 118 में
देवि सीता तपस्वनी अनुसुइया को अपनी उत्पत्ति एवं विवाह का प्रसंग बताती है। वहां ’’तस्य
लांगूलहस्तस्य कृषतः क्षेत्रमण्डलम्’’ अथवा ’’मुट्ठी के औषधि बीजों को बिखेरने का प्रसंग’’।
इसके अतिरिक्त अधिक स्पष्ट प्रसंग
अरण्यकाण्ड 16/5, 16, 7 का है जहां लक्ष्मण राम से शरद ऋतु का वर्णन
कर रहे हैं। श्लोक ’’5’’ में ’’पृथ्वी सस्यमालिनी’’ पद
कृषिद्योतक है तो श्लोक संख्या 16 एवं 17 का का कृषि संबंधी अंशानुवाद यथावत यहां
प्रस्तुत है। (अनुवाद - रामायण - गीताप्रेस गांटखपुट)
16- जौं और
गेहूं के खेतों से युक्त ये बहुसंख्यक वन भाप से ढके हुए है ...।
17- ये सुनहरे
रंग के धान, खजूर के फूल से आकार वाली बालों से जिनमें चावल
भरे हैं, कुछ लटक गए हैं।
उपरोक्त अथवा ऐसे ही कतिपय अन्य प्रसंग
रामायण के तथ्यों को आंख बंद कर स्वीकार करने वालों के मत में रामायण में कृषि को
स्वीकार करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं और इनकी आलोचना नही की जानी चाहिए।
किंतु वैज्ञानिक दृष्टि से चिंतन करने पर रामायण द्वारा प्रस्तुत अन्य प्रसंगो एवं
सन्दर्भों के सापेक्ष इनका विश्लेषण किया जाना चाहिए।
रामायण के
यात्रा प्रसंगो में अदृश्य ’’कृषिकर्म’’:-
रामायण विभिन्न पात्रों के माध्यम से
तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप की यात्राएं करवाती है। इन यात्राओं के मध्य पात्रों
द्वारा दृश्य नगर, ग्राम, पर्वतों,
वनस्पतियों, वृक्षों, नदियों, निर्झरों
एवं ऋषि मुनियों की विस्तृत सूचना उपलब्ध कराती है। किंतु आप कृषि के संबंध में
कोई भी स्पष्ट संकेत नही पाते। इस संदर्भ में तीन यात्रा प्रसंग अयोध्याकाण्ड के
हैं।
अयोध्या राज्य
के दूतों का भरत को ननिहाल से बुलाने जाना:- अयो0 काण्ड 68/12-22 तक उस यात्रा का
मार्ग का वर्णन है जिससे चलकर दूत अयोध्या से गिरिवर (भरत की ननिहाल) पहुंचते हैं।
यात्रा पथ:-
अयोध्या से प्रस्थान उपरान्त मार्ग के जो चिहन वर्णित हैं तदनुसार यात्रापथ इस
प्रकार हैं:-
अपरताल पर्वत -
प्रलम्बगिरि के मध्य से बहने वाली मालिनी नदी का तट - हस्तिनापुर - गंगा पार कर -
पश्चिम की ओर पांचाल देश - कुरूजागंल - शारदा नदी का तट - तेजाभिभवन नामक ग्राम -
अभिकाल नामक ग्राम - वाह्वीक देश - गिरिव्रज नगर (भरत की ननिहाल)
मार्ग के
दृश्य:- मार्ग में फूलों से सुशोभित सरोवर - निर्मल जलवाली नदियां - स्वच्छजल और
भांति-भांति के पक्षियों से सेवित दिव्य नदी शरदण्डा - शरदाण्डा के पश्चिम तट पर ’’सत्योपयाचन’’ नामक
वृक्ष - कुलिंगानगर - इक्षुमती नदी - तपस्वी ब्राहम्णों का दर्शन - सुदामा पर्वत -
विपाशा नदी - शाल्मली वृक्ष - नदियां, पोखर, तालाब, सरोवर आदि का वर्णन है।
समालोचना:- दूत
जिन वस्तुओं का दर्शन करते हैं उनका सामान्यीकरण भी है और शाल्मली वृक्ष, सत्योपयाचन
वृक्ष, आदि विशिष्ट वर्णन भी हैं किंतु खेत, हल, बैल, जौ, धान, गेहूं, गन्ना
आदि फसलें अथवा जोते जाते या जुते हुए खेत,
काम करते किसान कहीं दिखाई नही देते।
दूत वर्तमान ’’पंजाब’’
के क्षेत्र से निकलते हैं वर्तमान का
कृषि प्रधान क्षेत्र किंतु उस समय दूतों को वहां भी खेत दिखाई नही देते।
भरत का यात्रापथ
- गिरिव्रज (ननिहाल) से अयोध्या:- जिस मार्ग से दूत भरत को बुलाने आए हैं, भरत
वापसी यात्रा उस मार्ग से तय नही करते। भरत का मार्ग है - गिरिव्रज से पूर्व दिशा
की यात्रा प्रारम्भ की - सुदामा पर्वत - हादिनी नदी - सतलज नदी (शतद्रु) - ऐलहान
गांव में स्थानीय नदी पार की - अपरपर्वत जनपद - शिला नामक नदी - वहां से आग्नेय
कोणस्थ शल्यकर्षण देश - शिलावहा नामक नदी - चैत्ररथ वन - सरस्वती गंगा - संगम -
वीरमत्स्य देश के उत्तरवर्ती देशो में प्रवेश - भारूण्डवन - कुलिंगा नदी - यमुना
तट - अंशुधान ग्राम के निकट भागीरथी गंगा - प्राग्वट नामक विख्यात नगर - गंगापार -
कुटिकोष्टि नदी - धर्मवर्धन ग्राम - तोरण ग्राम के दक्षिणार्ध से - जम्बूप्रस्थ -
वरूथ ग्राम - उज्जिहाना नगरी - कंदव वृक्षों की बहुतायात - सर्वतीर्थ नामक ग्राम -
उत्तानिका नदी - हस्तिपृष्ठ ग्राम - कुटिका नदी - लोहित्य ग्राम - कर्पावती नदी -
एकसाल नगर - स्थाणुमती नदी - विनत ग्राम - गोमती नदी - कलिंग नगर - सालवन - सालवन
लांघकर प्रातःकाल अयोध्या। यात्रा में लगा समय - 7 रात्रि
मार्ग के
दृश्य:- उज्जिधना नगरी में कदम्ब वृक्षों की बहुतायात - अयोध्या से तत्काल पूर्व
सालवन - मार्ग के दृश्यों में सामान्यीकरण है। दूतों के यात्रा पथ की तरह कोई
विशिष्ट चिहन नहीं है।
समालोचना:- बिन्दु
1 की समालोचना की तरह खेत, फसलें और कृषक कहीं नही है।
अयोध्याकाण्ड में दो यात्राएं और हैं। एक
यात्रा राम करते हैं और दूसरी भरत। दोनो ही यात्राएं अयोध्या से चित्रकूट तक की
हैं। राम की चित्रकूट से आगे की यात्रा लंका तक की है। इनमें भी मार्ग के गांवो, वन
प्रदेशों में न समयानुकूल धान्य फसलें कहीं दिखाई देती हैं और न ही किसान, हल, बैल, खेत
आदि। अरण्यकाण्ड में दो यात्राएं रावण भी करता है। यात्रा मार्ग है लंका - मारीच
आश्रम और पंचवटी - लंका। खेत यहां भी नही हैं।
इनके अतिरिक्त अयोध्याकाण्ड में महर्षि
भरद्वाज भरत की सेना का स्वागत करते हैं। अपने तपोबल से नाना प्रकार के पदार्थ
उत्पन्न करते हैं। इसमें जो खाद्य पदार्थ हैं उन पर दृष्टि डालें तो भोजनों के इस
वर्णन में कोई वैशिष्ट्य नही है। भारतीय व्यंजन परम्परा में षटरस वाले छप्पन भोगों
का वर्णन है। नाना प्रकार के अन्न, दूध आदि पदार्थो से बने पकवान हैं। उनका
विशिष्ट नाम और विशिष्ट स्वाद है। किंतु मुनि भरद्वाज के ’’मीनूकार्ड’’ में
किसी भी अन्न निर्मित पकवान का नाम नही है।
अरण्यकाण्ड के सर्ग 16 श्लोक संख्या 5, 16, 17
में लक्ष्मण राम से शरद ऋतु का वर्णन करते हुए जौ, गेहूं, जड़हन, धान जिनमें चावल भरे हैं का एक साथ
वर्णन करते हैं। क्या शरदऋतु में जौ, गेहूं, धान एक साथ पाया जाता है। श्लोक है -
’’वाष्पाच्छन्नारण्यानि यवगोधूमवन्ति च
............। 16।
खर्जूर पुष्पाकृतिभिः शिरोभिः
पूर्णतण्डुलैः
शोभते किंचिदालम्बाः शालयः कनकप्रभाः
......... । 17।
यह उपरोक्त वर्णन शरद ऋतु वर्णन के अन्तर्गत
है। शरद ऋतु में आश्विन - कार्तिक मास शामिल है। अर्थात सित - अक्टूबर लगभग गेहूं
- जौ, रबी की फसलें हैं जो दिसम्बर - जनवरी में बोई
जाकर मार्च - अप्रैल में काटी जाती हैं इस समय 00 से लेकर औसतन 300-32.50 तक औसत
तापमान एवं दबाब रहता है। चावल खरीफ की फसल है जो जून - जुलाई में बोई जाकर
सितम्बर - अक्टूबर में काटी जाती हैं। जून में लू नामक गर्म हवायें चलने लगती हैं
और तापमान 450 से भी अधिक चला जाता है। तो अक्टूबर में तापमान 220 से 250 तक गिर
जाता है।
निष्कर्ष:-
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्वीकार करने में कोई असुविधा नही होनी चाहिए कि
रामायण काल के लोग हल, जुताई, खेत, सिंचाई,
फसल धान से चावल व बालियों से गेहूं
अलग करना आदि से परिचित नही है। संभव है किसी तरह मिटटी की ऊपरी परत को खुरचकर या
खोदकर कुछ बीजों का बोना सीख गए हों। कंदमूल,
फल,
औषधियों आदि का जैसा वर्णन मिलता है
उससे यह स्वीकार किया जा सकता है कि संभवतः कृषि के प्रारम्भिक रूप से रामायण
कालीन लोग परिचित हैं।
(….. अनवरत्)
[नोट:- इस आलेख को कदाचित इस लोकमान्यता की जगजननी मां
सीता का जन्म रत्नगर्भा मां धरती की कुक्षा से हुआ है, के
विरूद्ध किसी भी प्रकार का उपयोग करना विधिक अपराध होगा। लेखक स्वंय और ’’तृषाकान्त’’ इस
लोकमान्यता कि मां सीता अयोनिजा थी और उनका जन्म मां धरती की कुक्षा से हुआ था के
प्रति श्रद्धावनत है और पूर्ण आस्था के साथ इस लोकास्था को स्वीकार करता है।]
©तृषा’कान्त’
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