ओ पिता ! ..... [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
लगा है एक युग मुझे,
पहचानने में तुम्हें
माँ होती है धरती,
गेहूँ अथवा जौ
बोया गया किस खेत में,
कोई अन्तर नहीं पडता,
हृदय पोषित तत्व से
उगती है जो फसल,
नाम क्या.. पहचान क्या,
फिर कौन हूँ मैं ..
वह तो है बोया बीज,
मैं जो भी हूँ वह हो ‘तुम’
हे पिता !पीड़ा दी है
बहुत तुम्हें ..
स्वयं को त्यागी..
महान और वीतरागी,
सिद्ध करने के दर्प में,
क्षमा याची .. ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..
सब कुछ भूल,
आश्वासन बचपन का,
आज फिर …
चिपट कर लिपट कर
रोना चाहता हूं ..
और पुकारता हूं..
हे पिता !
लगा है एक युग मुझे
पहचानने में .. तुम्हें,
दर्द से आकुल …
सीने से उठता ज्वार
फूट पड़ता है आंखों से,
और तभी …
केवड़े की गंध से
भर जाता है मेरा कमरा,
खिड़की से प्रवेश करता है
हवा का एक झोंका
मेरे आंसू सुखाने लगता है.
©तृषा’कान्त’


4 टिप्पणी:
धरती और बीज का रूपक अत्यंत सटीक और सुंदर है। बेहद भावपूर्ण, दिल को छूने वाली अभिव्यक्ति! इस सुंदरतम रचना के लिए बधाई !
पिता जी को समर्पित भावपूर्ण कविता.
स्वयं को त्यागी..
महान और वीतरागी,
सिद्ध करने के दर्प में,
क्षमा याची .. ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..
आह भी और वाह भी !एक पुत्र की सशक्त भाव-अभिव्यक्ति जो मन को छू गयी.
आ० अल्पना वर्मा जी एवं सुशीला जी .. !
रचना पर आपकी प्रतिक्रिया प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार ।
क्या कहूँ ..पिताजी पर कोई भी रचना मुझे निशब्द छोड़ देती है.
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