सोमवार, मई 14, 2012

झरते हरसिंगार .... [नवगीत] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

उजसित शैशव जीवन सुरभित 
हुलसित मन आगार 
शेफाली शाखों सा झूमे 
झरते हरसिंगार 


मलयानिल सुरभित नासाग्रा 
होंठ वसन्ती कोंपल 
पल पल पुलकित स्पर्शों से 
हस्त पाद मृदु कोमल 
मृदुल मोहिनी शिशु किलकारी 
वारी सब संसार 


अखिल विश्व में नूतन अभिनव 
ईश स्वयं धर रूप सलोना 
डगमग धरता पग धरती पर 
मानवता का भूप खिलौना 
राग द्वेष से मुक्त स्नेह ही 
जीवन का आधार
©तृषा’कान्त’

2 टिप्पणी:

shikha varshney सोमवार, मई 14, 2012 3:56:00 pm  

आपकी गीतों में अप्रितम सौंदर्य मिलता है.

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ मंगलवार, मई 15, 2012 7:36:00 pm  

रचना पर प्रतिक्रिया के लिये
आभार शिखा जी

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