वावरे ..! किस चाह में ..... [ गीत ] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
आदि से जग राह में
क्यों फिरे उद्विग्न अंतस
वावरे ..! किस चाह में
भीड़ भी पुरशोर है
डगर पथरीली कठिन भी
मनुज मन कमजोर है
बह गया बहुधा लहर से
तुमुल करतल वाह में
वावरे ..! किस चाह में
कालिमा कुत्सित तमस की
हाय मानव छल गयी
मोह माया रज्जु बन्दी
सकल उर्जा जल गयी
डोर अब अव्यक्त खींचे
ढोर बांधे रज्जु से
छूटते सब संग साथी
दिव्य आभा पुंज से
अहा अब अभिसिक्त यौवन
अलौकिक किस राह में
वावरे..! किस चाह में
©तृषा’कान्त’



1 टिप्पणी:
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