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समाचार मेरा ध्यान आकर्षित करता है। मैं संक्षेप में आपका ध्यान उस ओर आकर्षित
करता हूँ। दैनिक जागरण, बरेली 26 मार्च 2012 - समाचार शीर्षक ''संस्कृत बनेगी नासा की भाषा''।
यह समाचार यह बताता है कि 1985 में
नासा ने संस्कृत भाषा के 1000 प्रकाण्ड विद्वानों को नौकरी देने का प्रस्ताव दिया
था जिसे विद्वानो ने अपनी भाषा के विदेशी उपयोग के लिए ''सेवा देने के आधार पर ठुकरा दिया था।
अब वह अपने ही लोगो को इस भाषा में पारंगत बनाने में जुटे हैं। समाचार पत्र की इस
रिपोर्ट के अनुसार नासा के ''मिशन
संस्कृत'' की पुष्टि उसकी बेबसाइट भी करती है।
उसने स्पष्ट लिखा है कि 20 साल से नासा संस्कृत पर काफी पैसा और श्रम व्यय कर चुकी
है।''
इस समाचार के दो पक्ष हैं एक संस्कृत
भाषा की वैज्ञानिक उपयोगिता और द्वितीय संस्कृत के विद्वानों द्वारा विदेशी प्रगति
के लिए अपनी भाषा की सेवा से इन्कार कर देना। सामान्यतः इस देश में संस्कृत के
अधिकांशतः विद्वान ब्राह्मण हैं। जब देश में ब्राहमणों पर देश के इतिहास, हिन्दुओं की सामाजिक श्रेणीगत व्यवस्था
एवं राजनीति को प्रदूषित करने के आरोप पानी पी-पी कर लगाये जाते हैं। हमें अपमानित
करने वाले नारे गढ़े जाते हैं। ऐसे में यह समाचार आंख खोलने वाला है। यह देश हमारा
है। इसकी उन्नित में मिटटी की सुगन्ध है। भला पैसा और उच्चस्तरीय जीवन पद्धति उन
आदर्शों और देश के मान-सम्मान से प्रतिस्पर्धा कैसे कर सकती है जो हमारे पूर्वजों
ने आत्म गौरव के रूप मे हमें विरासत में दिए हैं। मैं जानता हूँ कि धर्म निरपेक्ष, प्रजातांत्रिक भारत में संस्कृत
महत्वपूर्ण नहीं हो सकती क्योंकि यह हिन्दुओं की सांस्कृतिक भाषा है। यह ब्राह्मणों
की विश्व-मानवता को अमूल्य धरोहर है और ब्राह्मण तो जिताऊ मतदाता नही हो सकता।
लेकिन काश ! ब्राह्मण ही अपनी आंखे खोल पाते और संस्कृत के लोक जीवन के लिए संगठित
प्रयास कर पाते।
(कृपया विस्तृत समाचार दैनिक जागरण
हिन्दी समाचार पत्र दिनांक 26.03.12 पृद्गठ 15 पर देखा जा सकता है)
©तृषा’कान्त’
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