सोमवार, अप्रैल 09, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग -2 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र

....हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार - तृषाकान्त
(2) अश्व बनाम गदहा
रामायण में युद्ध काण्ड तक घोड़ों का उल्लेख पाया तो अवश्य जाता है किंतु अश्व और अश्वारोंहियों की जैसी विशेषताओं से ऋग्वेद हमें परिचित कराता है, रामायण उसके लेशमात्र का भी स्पर्श नहीं कर पाती। इस संबंध में प्रस्तुत आलोचना में रामायण के बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को सम्मिलित नहीं किया गया है क्योंकि रामायण के अधिंकाशतः शोधकर्ता उत्तरकाण्ड एवं बालकाण्ड को प्रक्षिप्त मानते हैं जैसे फादर कामिल बुल्के ’रामकथा’। अतः प्रथम दृष्टया इस बात के पर्याप्त प्रमाण माने जाने चाहिए कि रामायण की मूलकथा ’अश्वों’ से अपरिचित सी है। बाद में संहिताकारों ने समकालिक प्रभाव को ग्रहण करते हुए इस प्राणी को रामकथा से जोड़ दिया। किंतु मूलकथा का भाग न होने के कारण संहिताकारों को वह स्वाभाविकता प्राप्त नहीं हुई जो ऋग्वेद के संहिताकारों को प्राप्त हुई।
यहां पर एक अन्य तथ्य की ओर ध्यान देना आवश्यक है। अयोध्याकाण्ड से युद्ध काण्ड पर्यन्त हम राक्षसराज रावण का प्रथमवार साक्षात्कार अरण्यकाण्ड में करते हैं। अकम्पन के उकसाने पर रावण सीताहरण में सहयोग के लिए आमंत्रित करने हेतु मारीच के पास जा रहा है। रावण का रथ एवं उसके जुते हुए पशु देखिए।

तदेवमुक्त्वा प्रययौ खरमुक्तेन रावणः
     रथेना दिव्यवर्णेन दिशः सर्वाः प्रकाशयन्।
                          (अरण्य का./सर्ग 31/84)
विरोधाभास देखिए। रथ वाहक पशु है गधे और रथ सूर्यतुल्य संभवतः सोने का अथवा सोने जैसा।संस्कृत शब्द कोष ’खर’ का अर्थ करता है - ’गदहा’, खच्चर (वा.शि. आप्टे पृ0 324) गदहा हो अथवा खच्चर किंतु एक बात दोनों पशुओं में समान है। वह यह कि दोनो ही मन्दगामी पशु है। इन पशुओं की ख्याति गति और शक्ति के लिए नहीं है जैसे अश्व की है। 

पहली बार रावण मारीच तक जाता है। कितु मारीच के समझाने पर लंका वापस आ जाता है। पुनः जब शूपर्णखा लंका आती है। रावण को भड़काती है तो वह सीताहरण के लिए तैयार हो जाता है। पुनः मारीच के पास जाता है। पुनः उसका रथ देखिए !

   कामगं रथमास्थाय कांचनम् रत्नभूषितम्
पिशाचवदनै युर्क्त खरैः कनक भूषणैः।।
                               (अर का/सर्ग 35/6)
यहां स्पष्ट रथ सोने का है और वाहक ’’पिशाचवदनै युर्क्त खरैः अर्थात गदहे।’’ ’’पिशाच वदन’’ विशेषण से खच्चर मान सकते हैं क्या ? जो भी हो कितु मूलभाव यथावत ’’मंदगामी पशु’’। इसी काण्ड के सर्ग 42 में पुनः ’’पिशाच वदनै खरैः’’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार अरण्यकाण्ड में ’’रावण का वर्णन जहां भी अपने रथ पर सवार योद्धा के रूप में हुआ है। वहां रथवाहक पशु गदहा ही है। 

अरण्यकाण्ड के पश्चात रावण को हम युद्धकाण्ड में प्रहस्त की नील के हाथों मृत्यु के पश्चात रथ पर सवार होकर युद्ध के मैदान में देखते हैं। किंतु यहां उसके रथ में ’’तुरंगोत्तम राजियुक्तम’’ (यु0का0/सर्ग 59/7) उत्तम घोड़ों को जुता हुआ देखते हैं। मेरा प्रश्न यह है कि -

प्र01- यदि अब घेाड़े जोत दिए तो पहले गदहे क्यों जोते थे ? यदि हम यह मानें कि अब रावण युद्ध में जा रहा है। अतः घोड़े जुते हैं। तो ’परनारी’ वह भी राम जैसे शूरवीर की पत्नी के अपहरण में युद्ध नही हो सकता, यह संभावना तो मूर्ख भी नही मानता। रामायणकार तो रावण को महायोद्धा ही नही विद्धान भी मानते हैं। अतः उसे युद्ध की संभावना नहीं होगी यह मानना मूर्खता है और युद्ध हुआ भी ’जटायू के संग’

प्र02- यदि यह तर्क दिया जाए कि रावण को अपमानित करने के लिए गदहे रथ में जुते दिखाए गये तो व्यर्थ का तर्क है। कारण एक तो पहले गदहे जोते तो बाद में घोड़े क्यों जोत दिए ? दूसरे ’’रामायण’’ एक महाकाव्य है। महाकाव्य के वैशिष्ट्य के अनुसार धीरोदत्त नायक के चरित्र को उभारने के लिए वैसा ही श्रेष्ठ खलनायक रखा जाता है न कि विदूषक खलनायक। तीसरे रामायणकार ने अपने सभी पात्रों के चरित्र के पूरी गंभीरता से विस्तार दिया है तो ’रावण’ जो कि महान योद्धा एवं विद्वान है, उसके चरित्र के साथ वह ऐसा मजाक करेंगे, बात गले नही उतरती। तो क्या मान लिया जाए कि तत्समय सम्राटों के प्रयेाग में गदहे हो सकते हैं ?

यदि घोड़ो के प्रयेाग को संदिग्ध स्वीकार कर लिया जाए, साक्ष्य जिसकी अनुमति देते हैं, तो गदहे का प्रयोग वास्तविक सा लगता है। प्रश्न पुनः प्रथम अंक की तरह है कि अन्ततः सिद्ध क्या होता है ? बस यही की राम एवं उनके समकालिकों की ऐतिहासिकता की ओर एक कदम और। (अगले अंक में)
©तृषा’कान्त’

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