मंगलवार, अप्रैल 14, 2009

वह खोखला बूढ़ा बरगद मेरा पिता था [कविता] - शिवेन्द्र मिश्र

वो बरगद का वृक्ष

बुढ़ा गया था

उसकी जड़ों से फूट्कर निकले चिल्लड़
अब खुद बन गये थे जवान बरगद
और अपनी बलशाली शाखाओं
की नाजुक उंगलियों से
दे रहे थे बुढाते वृक्ष को सहारा
वह बूढ़ा बरगद थक गया था
झड़ गए थे उसके पत्ते
टूट फूट गईं थीं उसकी बलशाली शाखाएं
जिन पर हजार लाख पक्षी किया करते थे रैन वसेरा
सुबह की पहली किरण और फूट पड़ता था
चिड़िया जगत के चहचहाने का शोर !
वह भी दिन कभी हुआ करते थे

आज! आज तो खोखली जड़ों पर
ढहते ठूंठ का भार लादे खड़ा था वह असहाय ! निराश्रय!
अगल बगल के जवान बरगदों की उंगलियां
दे रही थीं उसे सहारा
वो बरगद जो कभी हुआ करते थे उसके ही बीज
ठूंठ या बेचारा अभागा बरगद असहाय !
लादे अपने दुर्भाग्य का भार
कर रहा था प्रतीक्षा हवा के तीव्रतम झोंके की
आए और विलीन कर दे उसके लौ मात्र
नि:शेष अस्तित्व को
विराट की गोद में सदा सदा के लिए
कर रहा था प्रतीक्षा वह म्रत्यु की !
हुआ करता था जीवनपुंज जो कभी

आज ! .....आज खु थे सभी
बरगद और ’बरगदीनियां’
क्योंकि हो गया था वो जिसकी उन्हें थी तीव्रतम प्रतीक्षा
आ गया था तूफान का झोका आज
और ढह गया था वह ठूंठ बरगद
बिजी थीं उनकी उंगलियां संभालने में जिसे
उधर एक तेज हवा के झोंके से वह हुआ था धडाम
और इधर तैर उठी थी
उनके ओठों पर मुस्कान चलो खत्म हुआ काम !
जीवन के दो रूप हा मैं सोचता
हाय जीवालम्ब बरगद ... वह ठूंठ बरगद
वह खोखला बूढ़ा सा बरगद क्या था पिता !

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सोमवार, अप्रैल 13, 2009

धूप आने दो हमारे पास ..[कविता]...श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

धूप आने दो हमारे पास
सूरज है हमारा भी

तुम हमारी ही जड़ों से
ख़ाद पानी चूस कर
इतरा रहे हो ?
दर्प की हर शाख से
हमको कुचलते जा रहे हो
और कितने झोपड़ों को
यों उजाड़ोगे.. ....?

'सत्तासुन्दरी' का साथ पाने के लिये…
महल आलीशान की हर नींव में
है दबा कोई हमारा भी
धूप आने दो हमारे पास
सूरज है हमारा भी

बाढ़ या सूखा
हमें ही उजड़ना क्यों है
मगरमच्छी आंसुओं में
हर बार हमको डूबना क्यों है
स्वर्ग वासी नियामक
हम 'स्वर्गवासी' हैं
'दूरदर्शन' महाप्रिय 
अब दर्शन दूर से ही दो
बन्द मुट्ठी में हवा है
अरे उसको छोड़ दो
आपके इस कुटिल सत्ता खेल में
घर उजड़ता है हमारा भी
धूप आने दो हमारे पास
सूरज है हमारा भी

आस्था अधिमान्यता को
कौटिल्यता से छोड़ दो
युगों से ‘जाग्रत-धरा’ की
‘भावना’ को छोड़ दो
हर न्याय के उपहास को
अपने लिये अब छोड़ दो
अन्यथा…
तूफान आने दो हमारे पास
यौवन है हमारा भी
धूप आने दो हमारे पास
सूरज है हमारा भी।

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