बुधवार, दिसम्बर 31, 2008

शहीदों और सैनिकों के सम्मान की बात किस मुंह से ...


( यह आलेख 5 दिसम्बर को लिखा गया था तब से अब तक वस्तुस्थिति में कोई परिवर्तन नहीं प्रतीत हो रहा है. यह अवश्य है कि राष्ट्रीय नेतृत्व जम्मू कश्मीर में अपनी संयुक्त सरकार बना लेने की प्रसन्नता के अतिरिक्त इस आलेख द्बारा पूर्व में व्यक्त की गयी संभावनाओं की ओर बढ़ता प्रतीत हो रहा है. आइये नववर्ष में ईश्वर से प्रार्थना और कामना करें कि ऐसा न हो और राष्ट्र इस बार आतंक के प्रति द्रढ़ता दिखा सके )

शहीदों और सैनिकों के सम्मान की  बात किस मुंह से ... !!


क्या आप में से किसी ने .... कभी रेलवे स्टेशन पर रिजर्वेशन कराने के लिए गए हुए किसी सैनिक के साथ रिजेर्वेशन करने वाले क्लर्क का अपमान भरा वर्ताव देखा है? बड़े बड़े शब्दों में देशभक्ति और सैनिकों के कल्याण का दावा करने वाले राजनीतिक और कार्यालयों में कार्य करने वाले जनता के लोग, सैनिकों के आत्मसम्मान को बहुधा ठेस पहुँचाने से भी परहेज नहीं करते। यह जो चार दिनों के लिए देश और शहीदों के नाम का जज्बा है समुद्र में आया तूफ़ान नहीं है....... शायद यह भी चाय की प्याली मैं आए तूफ़ान की तरह बैठ जाएगा ... आज का राजनेता भी यह बहुत अच्छी तरह जानता है और मीडिया भी।

उंगली पर गिने चुने एक या दो चैनेल को छोड़ दिया जाए तो सभी को पता है कि बहुत दिनों तक इसके सहारे टी आर पी नहीं बढ़ाई जा सकेगी। इसलिए बहती गंगा में जितना हाथ साफ़ कर सकते हो कर लो ......

संभवतः ताज होटल से सुरक्षित बाहर आने वाले एक सांसद का मीडिया पर बयान लोग अब तक नहीं भूल सके होंगे। इन महोदय ने मीडिया पर आते ही शेखी बघारते हुए कहा था कि वो तो योद्धा हैं डर कैसा .. ? वह तो अपने लैपटाप पर 'एन्जॉय' करते रहे। इन 'स्वयंभू बहादुर' नेता जी से क्या कोई पूंछना चाहेगा कि आतंकवादियों के आते ही दरवाजा क्यों बंद कर दिया....!!!! ? उन्हें बहादुरी से मुकाबला करना चाहिए था ... अथवा अपने प्रेरक भाषण से आतंकवादियों का हृदय परिवर्तन करने के लिये प्रयास करना चाहिए था। देश का दुर्भाग्य है कि यदि ऐसे राजनीतिक, नकली शेर योद्धा हैं तो फिर अमर शहीद मेजर उन्नीकृष्णन, हवलदार गजेंदर, हेमंत करकरे सहित अन्य बलों के अमर शहीद क्या हैं ....

माइक और कैमरा देखते ही शेर बन जाने वाले नेता जी संभल जाइये। देश की जनता को बहुत ही दुःख और पीड़ा पहुंचा चुके हैं आप ......... देश की जनता से यही निवेदन है कि किसी भी सैनिक के लिये सच्चे सम्मान से अधिक बड़ा प्रतिकार कुछ भी नहीं हो सकता है किंतु यह कुछ पलों का न होकर स्थाई बना रहे यही शहीदों के और उनके परिवारों के लिए सच्ची श्रृद्धांजलि होगी।

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मंगलवार, दिसम्बर 30, 2008

मुम्बई हमले के निहितार्थ .... (विश्लेषण )

      स्वंवत्र भारत के इतिहास के कई कायराना अध्यायों में एक अध्याय और जुड़ गया जब 26.11.08 को मुम्बई के शानदार होटलों यहूदी मेहमानों का ठिकाना नरीमन हाउस रेलवे स्टेशन व अस्पतालों पर आतंकियों ने एक साथ हमला किया। होटलों में रूके यात्री बंधक बना लिये गये सरकारें बाबुओं की फाइलों में घूमती रही इस बीच प्रजातंत्र का सबसे ताकतबर स्तनपायी जिसे प्राणी शास्त्रीयों की भाषा में नेता कहा जाता है सड़क संसद और मीडिया हर जगह से नदारद रहा।

      दस आंतकी कोहराम मचाते रहे और एक अरब आवादी वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, उभरती हुई महाशक्ति विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक सैन्य शक्ति में भी विश्व के सातवें आठवें राष्ट्र के रूप में प्राप्त हमें उन चूहो को मार गिराने में तीन दिन लग गये। जैसे हो खतरा खत्म प्रजातंत्र का सबसे ताकतवर स्तनपायी प्राणी नेता अपनी खोह का पत्थर खिसकाकर बाहर आ गया कहीं ताज के सामने बयान देने लगा तो कहीं टीवी चैनलों तथा प्रेस वार्ताओं हर मैदान में झूट्टल नाखूनों वाले पंजो मिट्टी खुरज, खुरज के हुंकारने लगा एक दूसरे को दुलत्ती मारने और कीचड़ उछालने उनमें प्रतिद्वंदिता होने लगी।    

      इधर क्षितिज पर युध्द के बादलों ने उमड़ना घुमड़ना शुरू कर दिया पाकिस्तान ने पूरे जोर शोर से युध्दोन्माद फैलाने का काम किया. मुझे लगता है मुम्बई हमले के दंश चुभने लगे हैं हमले के लक्ष्यों पर ध्यान दे:- 

1.होटल ताज एवं ओबराय

2.नरीमन हाउस यहूदियों का ठिकाना

3.रेलवे स्टेशन एवं अस्पताल 

तीन लक्ष्य, तीन उद्देश्य

      होटल ताज ओबराय पर किया गया हमला विशेषत: उभरती हुई भारतीय अर्थव्यवस्था सहित यूरोप और अमेरिका को एक गहरी साजिश इस समय जब विश्व मंदी से कराह रहा है ऐसे में विश्व के किसी भी आर्थिक केन्द्र पर गहरी चोट व्यापार के पहिये को और धीमा कर सकती है। मुम्बई पर हमला जहाँ हमारी कमजोर राजनितिक इच्छा शक्ति और कमजोर प्रषासनिक नियन्त्र क़ा संकेत तो देता ही है वही इसके निति हार्थ हमारी आर्थिक व्यवस्था को चोट पहुचाना भी है। दरअसल वैश्विक मंदी युग के इसमें ही हम यूरोप, अमेरिका की तरह प्रभावित नहीं हुए हैं लेकिन यदि हम व्यापक मंदी के शिकार हो जायें तो कौन कह सकता है कि बेरोजगारों की लम्बी फौज में से आंतकवादियों को एक नयी ज्यादा दिमागदार और ज्यादा सक्षम नर्सरी उपलब्द्ध नहीं होगी और यह देश भी आर्थिक विपदाओं से कराह उठेगा दरअसल मुम्बई हमला वह सटीक चोट है जिसके परिणाम अनाविशेष है किन्तु इस हमले के पीछे यदि आंतकवादियों का लक्ष्य उपरोक्त जैसा ही था तो मुझे लगता है कि एक इससे भी भंयकर आंतकी हमले का दु:स्वप्न देखने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। जहाँ तक मुम्बई हमले के दूसरे आंतकी हमले का प्रश्न है तो आंतकियों का यह हमला नरीमन हाउस पर हुआ था जो यहूदियों का ठिकाना है. शायद इस हमले के पीछे आंतकियों का ध्येय बाद में अपने समर्थन में दुनिया भर के और विशेषेत: मुस्लिम परस्त तथाकथित सैकुलर और कम्युनिस्ट नेताओं का ध्यान आकर्षित करना और अपने लिये किसी सीमा तक समर्थन जुटाना था। इससे मुझे ऐसा लगता है कि उच्च कोटि की योजना बेहतर तालमेल और सटीक प्रहार करने का यह उदाहरण है। येचुरी और अंतुले जैसे नेताओं के इस बयानों से आंतकी अपने इस लक्ष्य में एक सीमा तक कामयाब हुऐ भी हैं ।     

      हमले का तीसरा केन्द्र बिन्दु था रेलवे स्टेशन, अस्पताल सम्भवत: इसके पीछे आंतकियों की रणनीति ज्यादा से ज्यादा भय पैदा करना, कानून व्यवस्था के प्रति जिम्मेदार लोगों के बीच अफरा-तफरी का महौल पैदा करना और व्यवस्था को नपुंसक और नकारात्मक सिध्द करना। दरअसल अस्पताल और रेलवे स्टेशन जैसे लक्ष्य जहाँ आंतकियों के लिये सॉफ्ट टारगेट होते हैं। वहीं कानून व्यवस्था के लिए संवेदनशील और नर्म-गर्म स्थल. जिस तरह से हेमन्त करकरे सहित तीन जवान पुलिस अफसर एक भी आतंकवादी को स्पर्श किए बिना शहीद हो गये और हमले के बाद के दिनों में मुम्बई की सड़कों पर राजनीतिक आकाओं के विरूध्द जिस तरह का माहौल दिखा कि आंतकी उम्मीदों से अधिक मात्रा पाने में कामयाब हुऐ, इससे यह भी प्रतीत होता है कि मुम्बई पुलिस के पास ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कोई आपात योजना नहीं थी जबकि उससे ऐसी योजना की आशा रखना स्वाभाविक है, जबकि मुम्बई में पहले भी ऐेसे सीरियल ब्लास्ट हो चुके हैं। मुम्बई हमले के कारणों पर निगाह डालें तो यह हमला उन तत्वों की कारस्तानी है जिन्हें पाकिस्तान नॉनस्टेट-प्लेयर कह रहा है और मैं अपनी समझ से पाकिस्तान के अधिकृत बयान से सहमत हूँ। तो इस हमले के मुख्य लक्ष्य पर बिचार करना होगा, जबकि नि:संदेह हमारी आर्थिक गति को थामने की साजिश हो सकती है। यदि ऐसा है तो यह हमला तो चिंगारी है आग तभी लग सकती है जब पाक और भारत में युध्द हो और यह युध्द परमाणु युध्द और विश्व युध्द तक बढाया जाये। पाकिस्तान के नॉनस्टेट-प्लेयर युध्द को भड़काने और बढ़ाने का प्रयास करेंगे। यदि इस तथ्य को क्षण भर को स्वीकार कर लें इसकी जड़े, सभ्यताओं के संघर्ष में निहित होंगी और इसके हाथ.. ओसामा बिन लादेन और संभव है, इसका मस्तिष्क विश्व की नजरों से अदृश्य होकर कहीं और हो. वैसे हमें इससे एक और भी आंतकी हमले के लिए तैयार रहना चाहिए। क्या भारत और पाक इसे नहीं समझ रहे हैं या शेष विश्व इसे नहीं समझ रहा। मुझे लगा है भारत पाक सहित शेष विश्व इसे समझ रहा है किन्तु भारत और शेष विश्व इससे निकलने और इसे रोकने का एक ही रास्ता देखते हैं कि पाकिस्तान को अपने नॉनस्टेट-प्लेयर को रोकने के लिये बाध्य करें और पाकिस्तान इसी स्थिति से बचने के लिए युध्दोन्माद पैदा कर रहा है, लेकिन युध्द शायद नहीं। कम से कम अभी तो नहीं मुम्बई हमले के निहितार्थ भारत सही संम्पूर्ण विश्व को पाकिस्तान स्टेट और उसके नॉनस्टेट-प्लेयर की बैक बोन अर्थात संसाधनों पर प्रहार करने को बाध्य करेंगे। आने वाले दिनों में गतिविधियों में और तेज दिखाई देनी चाहिए। 

शिवेंद्र मिश्र, 24 A आशुतोष सिटी, बरेली ( उ. प्र. )

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सोमवार, दिसम्बर 29, 2008

धरती के फूल

धरती के फूल

उग आए हैं इस बार....

राजनीति की आँधी,

और आतंक की बेमौसम

'मुंबई बरसात' से

होती हैं जड़ें बहुत गहरी

सुना है पाताल तक ...

धरती के फूल की

कंक्रीट के जंगल में

पांचसितारा संस्कृति में

परोसे जाने वाले व्यंजन ने

फैला दी है अपनी

खेत खलिहान ...

विलोपित जंगलों से लाई

खालिश देशज उर्जा

..और माटी की गंध सड़कों पर

धरती के फूल ......

यानी कुकुरमुत्ते की जाति...

उगते हैं उसी जगह

जहाँ करते हैं बहुधा

'कुत्ते' टांग उठाने की राजनीति

गाँव की विलुप्त बिजली के खम्भे पर

प्रधान जी के 'स्कूलनुमा-बारातघर' में

अथवा भीड़तंत्री गाड़ी के

'अन्तुलाते' पहिये पर

वोटबैंक की तुच्छ बीमारी से लाचार.. ..

सत्तालोलुपता से दंशित राष्ट्र

पी सकेगा क्या ...इसबार

राष्ट्रीय स्वाभिमान का

उर्जावान पंचसितारा सूप

मिट्टी से पैदा धरती के फूल का

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रविवार, दिसम्बर 28, 2008


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रविवार, दिसम्बर 07, 2008

चक्रव्यूह में फिर... अभिमन्यु

घिर गया है
चक्रव्यूह में फिर...
आज का अभिमन्यु
भ्रष्टाचार का दुर्योधन
सत्ता के रथ पर सवार
कर रहा है निरंतर
वार पर वार

राजनीति के द्रोणाचार्य ने
रचा है मानव मूल्यों से दूर
अनैतिकता का व्यूह
सत्ता की भूमि जायेगी
शायद इस बार
इनके साथ साथ
मृत्यु महानद के पार
अब किसी भोज का
'शोणित पत्र' करता नहीं
विचलित इन्हें

वंचना के कृपाचार्य
कीर्ति कवलित कर्ण
मानव मर्यादाओं से दूर
राष्ट्र अभिमन्यु पर
नित नवीन वार

देशप्रेम नैतिकता
निष्ठा के अर्जुन
घिर गये हैं
समरांगण से दूर

क्षत विक्षत घायल
आज फिर अभिमन्यु
परिचित अपरिचित
एक द्रष्टि
उसके तुणीर में
एक नयी स्रष्टि
शिष्य हूँ कृष्ण का
रणछोड घरछोड क़ा
होगी नहीं पुनरावृत्ति
उस विगत इतिहास की

अतः हे तात
आधुनिक राष्ट्र के दुयोधन
और सप्त महारथी सुनो
जन्म ले चुका है
एक नया अभिमन्यु
इस राष्ट्र के गर्भ से

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

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शनिवार, दिसम्बर 06, 2008

आयें आज सही अर्थों में हम कारवां बनायें

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में आज जो कुहासा छाया हुआ है इसका हल केवल राष्ट्रीय जनमानस के पास ही है नेताओं और संस्थानों से अपेक्षा के बिना जो मानवीय सैलाव सड़कों पर उतरा है उसे सही दिशा में ले जाते हुए सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय चेतना के रूप में परिवर्तित करने की क्षमता बुद्धिजीवी वर्ग में ही है.. ग्लैमर की दुनिया से अप्रभावित रहकर आयें आज सही अर्थों में हम एक कारवां बनायें. जाति वर्ग धार्मिक आस्थाओं के भेदसे विहीन एक नए समाज का ...... प्रयास जारी रखें और सच्ची राष्ट्रीय चेतना की इस लौ को किसी को बुझाने न दें

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बुधवार, दिसम्बर 03, 2008

ओ भारती फिर जाग रे !

वक्त करवट ले रहा है

सलवटों को तुम न देखो

हाथ या माथे खिचीं जो

वो लकीरें तुम न देखो

 

आज पौरूष फिर पुरू का

समय ने ललकार डाला

युग पुरूष ने स्वयं आकर

गाण्डीव फिर तम से निकाला

 

अधर पर पाञ्चजन्य रखकर

लो कृष्ण अब फिर से पुकारे

दुरभिसंधि.... व्यूह युग का

द्रौपदेय को फिर से पुकारे

अभिषेक है रण बांकुरे

ओ भारती फिर जाग रे

 

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मंगलवार, दिसम्बर 02, 2008

घिन आने लगी है तुमसे ....

लगते थे ....
बहुत अच्छे तुम
बातें तुम्हारी .....
सीधे दिल के अंदर
नसों में खून .....
उबलने लगता था
कुछ भी करने को आतुर

चिलचिलाती धूप में
पसीने से लथपथ ..
आते थे जब भी ..
भटकते हुए मांग कर
किसी से 'लिफ्ट'
अथवा पैदल ...

तुम्हारा भूखा प्यासा
पदयात्रा से थका चेहरा
कर देता था व्याकुल
हर गावं में मां को ..
दौड़ पड़ती थी बहना
ले पानी का गिलास
भाभी टांक देती थी बहुधा
तुम्हारे ‘फटे हुए कुरते’ के बटन
बाबा सोचते थे हरबार
देने को एक नया कुरता
मुझसे पहले ….. तुम्हें

सीखा मैंने जिज्ञासु
तुम्हारे थैले में भरी किताबों से
नैतिकता, राष्ट्रप्रेम, त्याग, समाजसेवा
इतिहास और आदर्श का हर पाठ
उत्प्रेरित हो तुमसे ही ....
……………..
किंतु ......
जबसे देखता हूँ तुम्हें…
पहने हुए तरह तरह के मुखौटे
बदलते हुए टोपियाँ …. हरपल
निकलते हुए कार से
गावं के उस मिटटी के चबूतरे का
उडाते हुए उपहास .....

धूलधूसरित मां .....
घंटों देखती रहती है
नीले, पीले, लाल, हरे,
केसरिया झण्डों को..
विस्फारित नेत्रों से ....
आज सुनती है जब
'घोड़ामण्डी' के भाव
थूक देती है पिच्च से ..
और उसके चेहरे पर
पढ़ते हुए भाव …..
मुझे घिन आने लगी है
तुम्हारी नौटंकी से…
तुम्हारे चेहरे से ....
तुमसे ....


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