नाच रे मन बावरे
मधुमास आया--
चहुँ दिशि चहुँ ओर है
आनन्द छाया--
सज उठी है प्रकृति बाला
फूलों के श्रृगार से
उड़ रही है फिर सुगन्धि
मदन के अहसास से
पाँव में थरकन नयन में
प्रेम का उन्माद छाया---
तितलियाँ चहुँ ओर फिर हैं
नाचती हो बावली
भँवरों की टोली दिवानी
डोलती मदहोश सी
कामनाओं का हृदय से
जैसे हो झरना बहाया---
प्रेम की ऋतु है बसंती
प्रेम की मदिरा बही
हर कली हर फूल में फिर
दिख रही आभा नई
पीहू-पीहू की पुकारें
संग अपने वायु लाया---
टूटी है फिर से समाधि
योगी रूप महादेव की
कामतीरों से हैं जागी
प्रेम की सूखी नदी
चिर सुखी चिर तृप्त हृदय में
शून्यता का भाव आया---



