बुधवार, मई 23, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग - 7 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र

....हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार - तृषाकान्त
( 7 )  रावण का प्रेतकर्म   - जादू टोना

     रावण के प्रेत कर्म और मृतक के अन्तिम् क्रिया कर्म से संबंधित आश्वलायन गृहसूत्र में उल्लिखित पद्धति को ध्यान से पढ़े तो ऐसा लगता है कि किसी आदिम युगीन परम्परा के अवशेष हैं। संभव है कि धरती के किसी भाग पर ऐसी अथवा इससे मिलती जुलती शव निस्तारण संबंधी क्रूर परम्पराएं आज भी प्रचलित हों।
            ख्याति प्राप्त अन्तर्राष्ट्रीय यात्री एवं नोबुल पुरस्कार विजेता लेखक श्री बी0एस0 नायपॉल अपनी पुस्तक ’’द मॉस्क आफ अफ्रीका’’ (हिन्दी अनुवाद श्री नवेद अकबर - पेंगुइन प्रकाशन) के पृष्ठ 10 पर युंगाडा के धार्मिक/प्रशासनिक राजा कबाकाके अन्तिम् संस्कार का उल्लेख करते हैं - ’’कबाका मरते नहीं थे, गायब हो जाते थे। .................।’’ कबाका की तद्फीन सीधी सादी नही होती थी। इसमें बहुत से कार्य होते थे जो सुदूर अतीत से आए थे। ’(सुदूर क्योंकि जिन लोगों के पास लेखन या किताबें न हों वो अपने दादा, परदादा से आगे की चीजों को याद नहीं रख सकते) राजा की लाश को तीन माह तक धीमी आग पर सुखाया जाता था। फिर जबड़े की हड्डी को अलग करके उस पर मनकों और कौड़ियों का काम किया जाता। इसे मनकों के काम से मुक्त गर्भनाल, लिंग, अण्डकोष के साथ पशु त्वचा की थैली में रखकर यहां दफन कर दिष जाता। बाकी शरीर यानी गैर जरूरी आदमी को कहीं और फेंक दिया जाता।’’ क्या श्री नायपाल के उल्लेख, आश्वलायन के गृहसूत्र के वर्णन और रामायण में रावण के दाहकर्म के वर्णन के मध्य शव निस्तारण प्रक्रिया में वर्णित क्रूरता में कहीं कोई समानता है ? यदि हां तो श्री नायपाल का यह कथन भी मान्य होना चाहिए कि ऐसी मान्यताएं सुदूर अतीत का भाग होना चाहिए। इस प्रकार रामायण अथवा आश्वलायन में वर्णित शव निस्तारण कर्म में आदिमता की झलक स्पष्ट है। संभव है कि अफ्रीका की भांति भारत के आदिवासियों में भी यही अथवा ऐसी ही प्रथा प्रचलित हो।
(अनवरत्)  
                                                                                                                      
नोट:-किंतु श्रुतियों के रूप में हिन्दुओं ने इसका बेजोड़ तोड़ निकाला था। गाथाओं, कहानियों ने स्मृतियों को अक्षुण्ण बनाये रखने एवं ऐतिहासिक बीजों को अगली पीढ़ियों को हस्तान्तरित करने में सफलता प्राप्त की। 
©तृषा’कान्त’

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बुधवार, मई 16, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग - 6 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र

....हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार - तृषाकान्त
( 6 )  रावण का प्रेतकर्म ( - गंताक से आगे )
आश्वालयन गृहसूत्र मृतक के हृदय पर मेध्य पशु का हृदय रखने के स्थान पर, मृतक के हृदय पर चावल या आटे के दो पिंड रखने का विकल्प प्रदान करता हैं। वह इस प्रेत कर्म पद्धति को आधुनिक हिन्दू समाज से जोड़ती है। इस प्रकार से रावण के दाहसंस्कार विधि का विश्लेषण करें तो जहां इसका एक सिरा आदिम मानवीय समाज तक जाता है तो वहीं दूसरी ओर यह आधुनिक हिन्दू समाज से जुड़ता है।
अरण्य काण्ड सर्ग 17 श्लोक 22 में शूपर्णखा राम को अपना परिचय देते हुए कहती है -’’वीरो विश्रवसः पुत्रो’’। यह वाक्य उसने स्वंय को रावण की बहिन बताने के बाद रावणादि का परिचय देते हुए कहा है। ’’विश्रवा’’ को आनुषांगिक साक्ष्यों में आर्य ऋषि माना गया है। इससे ’रावण’ राक्षस नाम्ना आदिम जाति का आर्य मुखिया सिद्ध होता है। ’शव’ के दाहसंस्कार की पद्धति संभवतः इसी कारण से राक्षसों द्वारा स्वीकार की गई हो। किंतु राक्षसों की कतिपय अन्य शाखाओं में ’शव’ को मिटटी में दबाने की (वर्तमान में मुस्लिम अथवा कतिपय अन्य धर्मानुयायियों की तरह) परम्परा थी। इस विषय में स्वंय वाल्मीकि रामायण ही प्रमाण है। अरण्यकाण्ड सर्ग 4 श्लोक 22 एवं 23 में विराध स्वंय को गड्ढे में गाड़ने के विषय में राम और लक्ष्मण से अनुरोध करते हुए कहता है -
अवटे चापि माँ राम निक्षिप्य कुशली ब्रज रक्षसां गतसत्त्वानामेब धर्मः सनातनः।
श्री राम ! आप मेरे शरीर को गड्ढे में गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइए। मरे हुए राक्षसों के शरीर को गड्ढे में गाड़ना सनातन धर्म है। (परम्परागत धर्म)

’’अवटे ये निधीयन्ते तेषां लोकाः सनातनः’’

जो राक्षस गड्ढे में गाढ़ दिए जाते हैं। उन्हें सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।’’ इससे ऐसी सूचनाग्रहण की जा सकती है कि राक्षसों की स्थापित परम्परा ’शव’ को कब्र में दफन करने की है। किंतु रावण एवं उसके वंशजो ने दाहसंस्कार की परम्परा को अपनाया है। आश्वालयन गृहसूत्र में वर्णित विधि से विराध के कथन तक कुल मिलाकर एक ऐसा संकेत प्राप्त होता है जो संभवतः ठोस साक्ष्यों की ओर ले जाता है।

प्राचीन विश्व/भारत में कब्रों से प्राप्त साक्ष्य: आश्वालयन गृहसूत्र क्या किसी प्रचलित ’’शव निस्तारण’’ संबंधी कर्मकाण्ड का उल्लेख करता है अथवा किसी सुनी गई पूर्व परम्परा के तथ्यों को प्रचलित परम्परा के साथ मिलाकर प्रस्तुत करता है। मैं दूसरे के साथ हूँ।

विकीपीडिया इनसाइक्लोपीडिया:- Burial – wikipedia-en. International Burial, particularly with “grave goods, may be one of the earliest detectable forms of religious practice since as “Phillip Liberman” suggests, it may signify a “concern for the dead that transcends daily life.

Disputed, evidence suggests that the “Neanderthals” were the first human species to intentionally bury the dead. doing so in shallow graves along with stone tools and animal bones. इसके उदाहरण के लिए Shanidar ईराक में, इजराइल में Kebra और क्रोशिया में Krapenia. ऐसी कब्रों के सबसे पुराने प्रमाण 130000 वर्ष पुराने हैं। ऐसी कब्र Skhul cave at Qatzeh इजराइल में खोजी गई हैं।

Burial wekipedia encylopedia से ग्रहीत उपरोक्त उद्धरण से यह समझा जा सकता है कि 130000 वर्ष पुराने ऐसी कब्रों के पुरातत्विक साक्ष्य उपलब्ध हैं जो यह सिद्ध कर सकते हैं कि मानव के मृत शरीर के साथ मृत पशु अथवा उसके विभिन्न अंगो को मानवीय लाश के साथ दफनाया जाता था। किंतु प्रस्तुत साक्ष्य भारत उपमहाद्वीप से बाहर के हैं।
                                                                     (अनवरत्)
©तृषा’कान्त’

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सोमवार, मई 14, 2012

झरते हरसिंगार .... [नवगीत] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

उजसित शैशव जीवन सुरभित 
हुलसित मन आगार 
शेफाली शाखों सा झूमे 
झरते हरसिंगार 


मलयानिल सुरभित नासाग्रा 
होंठ वसन्ती कोंपल 
पल पल पुलकित स्पर्शों से 
हस्त पाद मृदु कोमल 
मृदुल मोहिनी शिशु किलकारी 
वारी सब संसार 


अखिल विश्व में नूतन अभिनव 
ईश स्वयं धर रूप सलोना 
डगमग धरता पग धरती पर 
मानवता का भूप खिलौना 
राग द्वेष से मुक्त स्नेह ही 
जीवन का आधार
©तृषा’कान्त’

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शनिवार, अप्रैल 21, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग - 5 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र

....हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार - तृषाकान्त
(5) रावण का प्रेतकर्म
विगत अंको में आपने ’’रामायण में अश्व’’ पर परिचर्चा को पढ़ा। इस अंक में मैं एक अन्य दृष्टि से इस विषय को प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। रामायण युद्ध काण्ड सर्ग 111 श्लोक संख्या 108 से 118 रावण की शवयात्रा एवं दाह संस्कार से संबंधित है। इन श्लोकों में से कुछ श्लोक ही विषय की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है। 112:- आगे जाकर रावण के विमान को एक पवित्र स्थान में रखकर अत्यन्त दुखी हुए। विभीषण आदि राक्षसों ने मलय, चन्दन, काष्ठ, पदमक्, उशीर, खस तथा अन्य प्रकार के चन्दनों द्वारा वेदोक्त विधि से चिता बनाई और उसके ऊपर रंकु नामक मृग का चर्म विछाया।’’ 114-115- उसके ऊपर राक्षसराज के शव को सुलाकर उन्होने उत्तम विधि से उसका पितृ मेध किया (दाह संस्कार) उन्होने चिता के दक्षिण पूर्व में वेदी बनाकर उस पर यथास्थान दधिमिश्रित घी से भरी हुई स्रुवा रावण के कंधे पर रखी और जांघो पर उलूखल रखा। 116:- काष्ठ के सभी पात्र, अरणि, उत्तराणि और मूसल आदि को भी यथा स्थान रखा। 117-118:- वेदोक्त विधि और महर्षियों द्वारा रचित विधि से वहां सारा कार्य हुआ। राक्षसों ने मेध्य पशु का हनन करके राजा रावण की चिता पर फैलाए मृगचर्म को घी से तर करके फिर रावण के शव को चन्दन और फूलों से अलंकृत करके वे राक्षस मन ही मन दुख का अनुभव करने लगे। 119:- फिर विभीषण के साथ अन्यान्य राक्षसों ने भी चिता पर नाना प्रकार के वस्त्र और लावा बिखेरे ..................। मैं उपरोक्त में से कुछ तथ्यों को अलग करता हूँ:- 1- रंकु नामक मृग का चर्म विछाना (श्लोक 112) 2- दधिमिश्रित घी से भरी श्रुवा रावण के कंधे पर व उलूखल जांघों पर रखना (115) 3- काष्ठ के सभी पात्र अरणि, उत्तराणि और मूसल आदि को यथा स्थान रखना (116) 4- मेध्य पशु का हनन करके राजा रावण की चिता पर .............. मृगचर्म को घी से तर करके ................. राक्षस मन ही मन दुःख का अनुभव करने लगे। कृपया प्रस्तुत तथ्यों को पुनः ध्यान से पढ़िए। पुनश्च डा0 बाबा साहब अंबेडकर द्वारा अपनी पुस्तक “The untouchables” हिन्दी अनुवाद’’ अछूत कौन और कैसे द्वारा आचार्य जुगुल किशोर बौद्ध में मृत क्रिया कर्म के संबंध में ’’आश्वलायन गृहसूत्र’’ से उल्लिखित इस क्रिया कर्म से तुलना करिए। (अछूत कौन और कैसे - डॉ0 बी.आर. अम्बेडकर अनुवादक (जुगुल किशोर बौद्ध) - पृष्ठ 89 से 90 अध्याय - क्या हिन्दुओं ने गौ मांस कभी नही खाया।) आश्वलायन गृहसूत्र 1. उसे तब निम्नलिखित (बलि के) औजारों को (मृत के शव पर) रख देना चाहिए। (यह यज्ञ-साधन है) 2. दाहिने हाथ में (चम्मच कहा जाने वाला) गुहु। 3. बाएं हाथ में (दूसरा चम्मच जिसे कहते हैं) उपभृत। 4. दाहिनी ओर स्फ्य कहा जाने वाली लकड़ी की बलिकर्म वाली खड्ग (तलवार), उसके बांई ओर अग्निहोत्री हवनी (अर्थात कलछी जिसके द्वारा अग्निहोत्र बलि का चढ़ावा चढ़ाया जाता है)। 5. उसकी छाती पर ध्रुवा (बलिकर्म की बड़ी जो कलछी कहलाती है)। उसके सिर पर पकवान। उसके दांतो में ठूंसे जाने वाले पत्थर। 6. नाक के दोनो ओर, छोटे बलिकर्म की कलछियां जिन्हें स्त्रुवा कहते हैं। 7. अथवा, यदि केवल एक स्त्रुवा उपलब्ध है, इसे तोड़कर (दो भाग करें)। 8. उसके दोनो कानों पर दो प्रसित्रहरण (अर्थात वे बर्तन, जिनमें ब्राहम्णों का बलि भोजन) रखा जाता है। 9. अथवा, यदि केवल एक प्रसित्रहरण है, इसे तोड़ दिया जाए (दो टुकड़ो में)। 10. पेट पर पत्री नामक बर्तन। 11. चपक (कप) जिसमें कटे हुए (बलि का भोजन) रखे जाते हैं। 12. उसके गुप्तांग पर सामी नाम की लाठी। 13. उसकी जंघाओ पर जलती लकड़ियां। 14. उसकी टांगो पर खल्ल (गारा) और मूसल। 15. उसके पैरों पर दो टोकरियां। 16. अथवा, यदि केवल एक (टोकरी) है, इसे तोड़कर दो भाग कर लिया जाए। 17. वह औजार जिनमें सूराख हैं (जिसमें तरल पदार्थ उडे़ले जा सकते हैं) छिड़काए गए मक्खन से भर लिए जाएं। 18. (मृतक का) पुत्र अपने लिए चक्की के नीचे और ऊपर के पाट ले ले। 19. तांबे, लोहे और मिटटी के बने औजार। 20. किसी मादा-पशु का झिल्ली (व्उमदजनउ) निकालकर उससे सिर और मुख (मृत व्यक्ति का) ढांक दे। (ऋग्वेद दस 16.7) का यह श्लोक पढ़े ’किन्तु अग्नि के विरूद्ध (जो तेरी रक्षा करेगा) कवच की गऊओं से प्राप्त होता है। 21. पशु के आंड (अण्डकोष) लेकर, वह उन्हें (मृत व्यक्ति के) हाथों में डाल दे, इस श्लोक (ऋग्चेद दस 14.10) के साथ शमीम के पुत्रों, दोनो कुत्तों से बचे दाहिना गुर्दा दाहिने हाथ में और बायां गुर्दा बाएं हाथ में हो। 22. पशुओं का हृदय मृतक के हृदय पर रख दें। 23. और कुछ आचार्यों के अनुसार आटे या चावल के दो पिंड। 24. केवल जब यदि आचार्य के अनुसार अंडकोष न हों। 25. पूरे (पशु के) अंग-अंग बांटने के बाद (इसके भिन्न-भिन्न अंग मृतक के वैसे ही अंगो पर रखकर) और उसे खाल से ढांक कर, वह उच्चारण करता है। हे अग्नि ! जब प्रणीता जल आगे ले जाया गया है तो इस कप को उलट मत देना’ (ऋग्वेद दस 16.8)। 26. अपने बांए घुटने को झुकाकर उसे बलि का चढ़ावा (नैवेद्य) दक्षिणा को अग्नि में इस मंत्र के साथ डालना चाहिए ’अग्नेय स्वाहा, कामाय स्वाहा, लोकाय स्वाहा, अनुमतये स्वाहा’। 27. (नैवेद्य) का पांचवा भाग मृतक के वक्ष पर इस मंत्र के साथ, ’निश्चय ही इससे हजारों का जन्म हुआ है। अब वह इसमें से पैदा हो स्वर्ग के लिए स्वाहा।’ आश्वलायन गृहसूत्र से उद्धृत ऊपर के परिच्छेद से यह स्पष्ट है कि प्राचीन इंडो-आर्यों में जब कोई व्यक्ति मर जाता था, एक पशु को मारा जाता था और शव को जलाने से पूर्व पशु के भागों को मृतक व्यक्ति के शरीर पर सभी भागों पर रखा जाता था।’’ यदि आश्वालयन गृहसूत्र में वर्णित उपरोक्त क्रिया से रामायण की दाह क्रिया की तुलना करें तो काफी कुछ समानता दिखाई देती है। इतना ही नही क्रमांक-23 इस शव निस्तारण की आदिम कर्मकाण्डीय प्रक्रिया को हिन्दुओं में प्रचलित आधुनिक शवदाह की प्रक्रिया से भी जोड़ता है। (अनवरत्)
©तृषा’कान्त’

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शुक्रवार, अप्रैल 20, 2012

प्रसिद्घ वेबज़ीन साहित्य शिल्पी 1 मई से कलेवर में


साहित्य शिल्पी के सभी मित्रों को सादर अभिवादन ...!
  जैसा कि विदित है आदरणीय सूरज प्रकाश जी प्रधान संपादक के रूप में 1 मई से साहित्यशिल्पी के नये अंक को प्रस्तुत करेंगे। संलग्न है उनके पत्र का संदेश ... आभार - तृषाकान्त
प्रिय मित्र ..!
   आपसे ये बात शेयर करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है कि मैं प्रसिद्घ वेबज़ीन साहित्‍यशिल्‍पी (sahityashilpi.com) के संपादन का कार्यभार संभालने जा रहा हूं। 

पहली मई 2012 का अंक नये कलेवर में निकलेगा। इसमें पहले की तरह कहानी, साक्षात्‍कार, यात्रा वृतांत, कविता, ग़ज़ल, आदि तो रहेंगे ही, हम कुछ नये कॉलम भी शुरू करने जा रहे हैं। ये नये स्‍तंभ इस तरह से होंगे: · 

आओ धूप- इसमें रचनाकार की अब तक कहीं भी अप्रकाशित रचना लेंगे। इसके साथ लेखक से आशय का पत्र भी लेंगे कि ये लेखक की पहली रचना है और अब तक कहीं प्रकाशित नहीं है। नेट पर तो बिलकुल भी नहीं। · 

भाषा सेतु- इसमें हम दूसरी भाषाओं से अनूदित स्‍तरीय रचनाएं आमंत्रित करेंगे। कहानी, कविता या मानविकी, विज्ञान। · 

मेरे पाठक – हम ये नया कॉलम शुरू करेंगे जिसमें हम किसी भी वरिष्‍ठ रचनाकार से उसके पाठकों से मिले अनुभव अपने पाठकों के लिए लेंगे। हर लेखक पाठकों के लिए ही लिखता है और उन्‍हीं के बलबूते पर लेखन में जिंदा भी रहता है। कई पाठक तो लेखकों को ऐसे ऐसे अनुभव दे कर जाते हैं कि लेखक को एक नयी रचना की ज़मीन मिलती है। हम यही अनुभव लेना चाहेंगे। · 

विरासत- इस कालम में हम कालजयी रचनाओं को पेश करना चाहेंगे। ये किसी बड़ी रचना का सार संक्षेप भी हो सकता है और रचना छोटी होने की स्थ्‍िति में जस का तस भी। · 

देस परदेस – इसमें महीने में एक बार हम उपलब्‍ध होने पर प्रवासी साहित्‍य लेना चाहेंगे। · हम एक कालम और शुरू करेंगे जिसमें नेट मीडिया पर अन्‍यत्र छपी बेहतरीन रचनाओं की, चल रही बहस की, उठाये गये मुद्दों की बात करेंगे। · 

मैंने पढ़ी किताब – इस कॉलम में हम विभिन्‍न स्रोतों से सद्य प्रकाशित किताबों के बारे में अपने पाठकों को बतायेंगे। हो सके तो किताब के कवर का स्‍केन, प्रकाशन संबंधी जानकारी भी देंगे। इसी कालम में हम स्‍तरीय किताबों के पढ़े जाने के बारे में भी फीडबैक लेंगे। · 

पठनीय – इसमें हम स्‍तरीय किताबों की समीक्षा आमंत्रित करेंगे और किताबें मिलने पर समीक्षाएं करवा कर प्रकाशित भी करेंगे। तो मित्रो, ये पत्रिका तो आप सब की है, आप सब के लिए है और निश्चित रूप से आप सबके रचनात्‍मक सहयोग से ही चलने वाली है। आपकी रचनाओं का हमें बेसब्री से इंतज़ार रहेगा1 हां, रचना भेजते समय ये ज़रूर देख लें कि वह पहले से ही नेट पर किसी और पत्रिका, ब्‍लॉग या वेबसाइट पर उपलब्‍ध न हो। 

आप यूं मान लीजिये कि हम अपने पाठकों को आपकी नवीनतम रचना के पाठ का सुख देना चाहेंगे। आपकी रचना के साथ आपका प्रोफाइल और फोटो भी मिले तो सोने में सुहागा। आप अपनी रचना मुझे mail@surajprakash.com पर या सीधे ही पत्रिका के पते sahityashilpi@gmail.com पर भेज सकते हैं। 

आपका अपना ही 

- सूरज प्रकाश 

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गुरुवार, अप्रैल 19, 2012

वावरे ..! किस चाह में ..... [ गीत ] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

जीव जीवन पथ अकेला 
आदि से जग राह में 
क्यों फिरे उद्विग्न अंतस  
वावरे ..! किस चाह में 
नगर में मेले मिले तो 
भीड़ भी पुरशोर है 
डगर पथरीली कठिन भी 
मनुज मन कमजोर है 
बह गया बहुधा लहर से 
तुमुल करतल वाह में 
वावरे ..! किस चाह में 

कालिमा कुत्सित तमस की 
हाय मानव छल गयी 
मोह माया रज्जु बन्दी 
सकल उर्जा जल गयी 
डोर अब अव्यक्त खींचे 
ढोर बांधे रज्जु से 
छूटते सब संग साथी 
दिव्य आभा पुंज से 
अहा अब अभिसिक्त यौवन 
अलौकिक किस राह में 
वावरे..! किस चाह में 
©तृषा’कान्त’

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सोमवार, अप्रैल 16, 2012

राम मिथ या इतिहास...भाग - 4 [आलेख] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र

....हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार - तृषाकान्त
(4) इतिहासोपयोगी रामकथा
राम से संबंधित सामग्री का प्रमाणिक ग्रंथ है रामायण। जिसके कृतित्व का श्रेय ’वाल्मीकि’ को दिया जाता है। जैसा कि विगत अंको में मैने ’रामायण’ के साक्ष्य के आधार पर कहा है कि रामायण संहिता है जिसका अभिप्राय है कि मूलकथा को समय-समय पर विस्तार दिया गया। डॉ0 फादर कामिल बुल्के जैसे ’रामकथा’ के प्रसिद्ध शोधकर्ता रामायण के बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रामणिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए उन्हें प्रक्षिप्त मानते हैं। डॉ0 बुल्के को आधार मानते हुए यदि सप्तखण्डीय प्रचलित रामायण में महीनतम् छलनी लगाकर ’’ऐतिहासिकता’’ के अनुसंधान हेतु ’रामकथा’ को शब्दो, आनुवांशिक कथाओं एवं अलंकारादि से रहित कर तलाश किया जाए तो ’रामकथा’ कुछ इस प्रकार कही जा सकती है।
संक्षिप्त ’’रामकहानी’’
श्री बुल्के के शोध प्रबन्ध के आधार पर प्राप्त तथ्यों के निचोड़ से जो रामकथा बनती है और हम जिसको राम एवं उनके समकालिकों की खोज में प्रयोग करने वाले हैं वह इस प्रकार है -
ऋग्वेद में ’राम’ दशरथ और इक्ष्वाकु का उल्लेख मिलता है। मिश्र के शासक रोमेसिस एवं मध्य एशिया की आर्य जाति ’मितान्नि’ में दशरथ नामक राजा का उल्लेख मिलता है। इन दोनों का काल 1300 से 1400 ई0सदी पूर्व श्री बुल्के मानते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहानी यों कही जा सकती है कि इक्ष्वाकु के वंश में दशरथ पुत्र राम का (1300-1400 ई0सदीपू0) जन्म हुआ। राम पिता की आज्ञा से अनुज लक्ष्मण एवं पत्नी सीता सहित 14 वर्षों के लिए वन चले गए। वन में पत्नी सीता का त्रैलोक्यजयी, महान विजेता, राक्षस राज रावण के द्वारा अपहरण कर लिया गया। राम ने वानर, गृद्ध, ऋक्ष आदि कबीलाई शासकों/समूहों के सहयोग से रावण का उसकी समस्त सेना के सेनापतियों, भाई बान्धवों सहित वध करके उसके ही भाई विभीषण को लंका का राज्य हस्तगत करवा दिया।
इतनी सी कथा का आलंकारिक विस्तार रामायण में है जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों की गवेषणा कर राम का ऐतिहासिक कालक्रम निर्धारित करना है। यह कार्य समुद्र से एक सच्चा मोती तलाश करने जैसा दुरूह कार्य है। हम कामिल बुल्के के तथ्यों को प्रथम दृष्ट्या अमान्य करते हैं। श्री बुल्के के काल निर्धारण को इसलिए स्वीकार नही किया जा सकता क्योंकि उनका शोध, रामकथा की ऐतिहासिकता की तलाश है। न कि राम रावण युद्ध के घटनाक्रम के ऐतिहासिकता की। ’रामकथा’ के पात्रों के नाम जहां तक प्राप्त हुए हैं श्री बुल्के उस कालखण्ड तक पहुंचे हैं किंतु रामायण में वर्णित तथ्यों पर उन्होने कोई भी अनुसंधानात्मक दृष्टि नही डाली है। अतः उनका मत (1300-1400 ई0 सदी पू0) अस्वीकार्य किए जाने के योग्य है।
©तृषा’कान्त’

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